परिवार

परिवार शब्द से ही हमे आत्मीयता का बोध होता है।भारतीय दर्शन में इसका महत्व अत्यधिक है। ये अलग बात है की धीरे धीरे परिवर्तित समय के अनुसार इसमें में बदलाव आना स्वाभाविक है।क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण हमारी मनोदृष्टि में बदलाव आया है।लेकिन फिर भी हम कितने ही आधुनिकता के शीर्ष पर खड़े हो,परिवार शब्द हमारे लिए महत्व रखता है।क्योंकि हमारे संबंधी में स्थिरता होती है ,अन्य संस्कृतियों की तुलना में।परिवार के अंतर्गत हम अधिकतर उन रिश्तों या संबंधों के व्यक्तियों को शामिल करते है ,जिनसे हमारा खून का रिश्ता होता है ,जैसे माता,पिता,भाई,बहन,बीवी,पुत्र,पुत्री,दादा,दादी,चाचा, ताऊ ।पर अब परिवार के दायरे में व्यक्ति के अन्य संबधो के लोग भी शामिल होने लगे है।अक्सर हमने यह देख , सुना या अनुभव किया होगा की हम अपने कार्यक्षेत्र , मित्र , अन्य गहन रिश्तों से संबंधित लोगो को भी परिवार के हिस्से के रूप में स्वीकार करते है या कोशिश करते है। जोकि वास्तव में आपके परिवार के सदस्य नही होते है ।व्यक्ति समाज में चल रही सभी क्रियाओं का अनुभव परिवार से सीखता है।परिवार होता तो सबका है ,पर सबके अपने अपने अनुभव होंगे ,कुछ खट्टे मीठे, कुछ कड़वे , कुछ सुखद, कुछ सुखद , ऐसे कई तरह के अनुभव शायद हम सभी ने अपने परिवार के बीच में पाया ही होगा।
परिवार व्यक्ति की पहचान का माध्यम भी है।आप किसी विशेष परिवार  का प्राचीन,वर्तमान स्थिति का अवलोकन करके उस परिवार के लोगो ने विशेष गुणों का अंदाजा अवश्य लगा सकते है।अनुवांशिक  गुण, दोष दोनो प्रकार के हो सकते है।इन अनुवांशिक गुणों में भी समयानुसार परिवर्तन होता है।
परिवार की महत्ता वर्तमान समय में लोगों की नजर में कम होती जा रही है।

इसके कई कारण है पर प्रमुख कारण है व्यक्ति का एकात्मक दृष्टिकोण।
मेरा मानना है की अगर व्यक्ति अपने परिवार के सदस्यों के साथ समय बिताता है , अपने कर्तव्यों को पूरी तरह निभाता है तो वह हर समस्याओं को हल आसानी से कर सकता है।क्योंकि मनुष्य की यह मनोवृति या स्वाभाविक गुण है की अगर उसके साथ या सहारे देने के लिए एक से अधिक लोग है तो वो मानसिक ,शारीरिक,आर्थिक और सामाजिक तौर पर अपने आप को सबल समझता है या साधारण भाषा में कहें तो उसका मनोबल काफी मजबूत हो जाता है।अब ये बात अवश्य ध्यान देने वाली है की परिवार में आपकी भूमिका क्या है,परिवार के सदस्यों के प्रति आपका व्यवहार कैसा है,परिवार में आपका प्रतिरूप बहुरूपी है या एकल छवि है आदि।अब निर्णायक तथ्य यह है कि व्यक्ति परिवार में अपनी उपयोगिता ,कार्य ,व्यवहार आदि सब उसी परिवार से ही सीखता है।अनुभव के द्वारा ही वह परिवार के बीच आचरण करता है और परिवार के बाद वही अनुभव वह समाज में रहकर समाज के अन्य लोगो के साथ करता है।इस बात से कोई परहेज या नकारा नहीं जा सकता की व्यक्ति के लिए पहली पाठशाला परिवार ही है। अच्छे आचरण,व्यवहार,क्रिया के द्वारा ही एक सभ्य समाज की कल्पना की जा सकती है।
हम अक्सर यह आसानी से कहते है की बदलते वक्त के अनुसार हमारे सभी क्रियाओं में भी बदलाव आने लगा है।जबकि मेरे हिसाब से ऐसा नहीं है समय स्थिर रहता है ।व्यक्ति अपने कार्यों को सुगम और आसान बनाने के लिए आधुनिक उपकरणों का प्रयोग करता है ,वो सही भी है क्योंकि नित नए अविष्कार भी हमारी ही देन है,लेकिन क्या इन सुलभ और आसान बनाने वाले उपकरणों से हम संबंधों,आचरणों, व्यवहारों, आदर्श क्रियाओं को नियंत्रित या पैदा कर सकते है? हम केवल अपने लक्ष्य,क्रियाओं को सरल और आसान बना सकते है।परिवार हमारे मनोवृतियों, व्यवहार और क्रियाओं से ही संगठित और स्थाई स्थिति में बन सकते है।मेरे अनुभव के अनुसार खुशदिल और परिस्थिति के अनुसार व्यवहार में बदलाव करने वाला व्यक्ति परिवार के सदस्यों के नजर में अच्छा माना जाता है।व्यक्ति का जब तक विवाह नहीं होता परिवार का दृष्टिकोण सकारात्मक रहता हैं,वहीं विवाह के उपरांत नकारात्मक में बदल जाता है।क्योंकि परिवार के सदस्यों द्वारा यह समझा जाता है की उनके मध्य अब एक माध्यम आ गया है,जिसे लेकर वो अपने आप को असहज महसूस करते है और अपना दृष्टिकोण बदलते है ।

ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति भी असहज हो जाता है क्योंकि वह नए पारिवारिक सदस्य के लिए आवश्यक वातावरण तैयार करने में और नए पारिवारिक परिवेश, संस्कृति , विचार के मध्य संतुलन बनाने और सहज बनाने में मदद करता है ।अगर वही वो नए सदस्य के प्रति अधिक कर्तव्यनिष्ठा का पालन करता है तो जायज है परिवार के अन्य सदस्यों का रुख उसके प्रति सकारात्मक नही होगा , वही अगर वो नए सदस्य की जगह अपने पारिवारिक सदस्यों को अधिक महत्ता देता है तो नया सदस्य  कभी भी व्यक्ति या अपने जीवनसाथी को एक मार्गदर्शक के रूप में  या आरामदायक स्थिति में अपने आप को नही महसूस करता ।इन दोनो परिस्थिति में पारिवारिक कलह का उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि परिवार के सदस्यों के मध्य कोई सीधी बातचीत या प्रत्यक्ष वार्तालाप नही होती ,किसी भी छोटे से छोटे से विषय पर भी ।सभी अपने अपने माध्यम के जरिए अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करते है फिर चाहे वो मध्यम पत्नी हो , माता पिता हो , बहन आदि भी हो सकते है। मुख्य बात यह रहती है इस अभिव्यक्ति के भावो
के ग्रहण और प्रेषण के स्वरूप में अंतर हो जाता है ।कहने का अर्थ है की अगर परिवार के किसी सदस्य ने कोई बात परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कोई बात कही है या इच्छा प्रकट की है तो माध्यम जोकि परिवार का ही सदस्य है ,वो इसमें कुछ भावों को जोड़कर या घटाकर उस पारिवारिक सदस्य के सामने प्रस्तुत करता है जिसके संदर्भ में अभिव्यक्ति या बातों का आदान प्रदान होता है।
 ये शायद सभी मानते होंगे की किसी कार्य को करने में हमारी विचारधारा का एक अहम भूमिका होती है ।अगर आप किसी के विचारों का अध्ययन करेंगे तो उसके व्यक्तित्व के साथ साथ उसके सामाजिक व्यवहारिक गुण का अनुमान लगा सकते है।वर्तमान समय में परिवार का स्वरूप बदलता जा रहा है और इसका उदाहरण खासकर क्षेत्र, संस्कृति , धार्मिक आधार पर भी देख सकते है ।अभी हाल में ही किसी जज साहेब द्वारा कही गई बात बहुत ही सटीक लगी और वह वाक्य है "जिंदगी कभी आसान नहीं होती ,उसे आसान बनाना पड़ता है ,कुछ बर्दास्त कर, कुछ संतोष कर और कुछ भुलाकर।" अगर ये धरना हमने अपना ली तो जाहिर सी बात है जीवन के हर रिश्ते में आप सफल होंगे ही होंगे।

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