कश्मकश
जिदंगी तेरा क्या कसूर ,तुझको अब मैं क्या कहूं
बस अफसोस यही है जिंदादिल न तुझे रख सका
पराए घर से आई है जो उसकी अब बात छोड़ दो
मैं अपने खून के रिश्तों को भी संभाल न सका
जिंदगी तेरा क्या कसूर, तुझको अब मैं क्या कहूं।
वक्त ये आ गया है की तुझसे अब किनारा कर लूं
पर कैसे इस नन्हे से चेहरे से अब किनारा कर लूं
बदलेगा ये वक्त भी इसका मैं कैसे भरोसा कर लूं
नही है साथ कोई मेरे किसका मैं सहारा कर लूं
जिंदगी तेरा क्या कसूर, तुझको अब मैं क्या कहूं।
अपनो की नजरों से मिलती अब नही मेरी नजर
किस्सा मेरा जमाने की नजरों से छुपा रहता किधर
हमसफर के साथ अब अधूरा सा दिखता है सफर
हजारों है मेरे अपने जमाने में जाऊं तो जाऊं किधर
जिंदगी तेरा क्या कसूर , तुझको अब मैं क्या कहूं।
चलों इस दुनिया से अलग ही दुनिया ही बना डालूं
छोड़ कर सारी यादें अपनो के नए सपने बुन डालूं
साया कोई छुड़ा पाता है क्या ये कैसे मैं भुला डालूं
सोचता हूं अब बस हंसकर सभी गमों को सह डालूं
जिंदगी तेरा क्या कसूर, तुझको अब मैं क्या कहूं।
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