संस्कृति की छाप
भारतीय संस्कृतिमैने किसी आर्टिकल में पढ़ा था कि बाहरी देश शायद जर्मनी में होटलों,रेस्तरां या खाने पीने वाली दुकानों में खाना छोड़ना दंडनीय अपराध या जुर्माना भरना पड़ता है ,इसलिए वहां के लोग खाना बर्बाद नही करते ।खासतौर पर आज के युग में भुखमरी से जूझ रहे लोग दुनिया देखा जाए तो कम नहीं है ।ऐसे बहुत से लोग है जिन्हे मुश्किल से एक वक्त का भोजन मिल पाता है।जर्मनी या अन्य देश द्वारा अपनाए गए ऐसे संस्कार या नियम बहुत ही अच्छे है,पर इन आधारों पर कोई भारतीयों या हमें ताना देता है की सबसे ज्यादा खाना बर्बाद करने में हमीं या भारतीय है ,इस बात से मैं पूरी तरह नकारता हूं।मेरे ख्याल से ऐसा कोई भारतीय नहीं होगा जो इस तरह का कार्य या भोजन की बरबादी करता होगा। क्योंकि हमारी संस्कृति इस प्रकार की है की भारतीय स्वयं भूखा रहकर किसी भूखे का पेट भरना ज्यादा पसंद करता है।
हमारे भारतीय संस्कार में खाना बनाने का एक अलग रिवाज कह लो या तरीका है।जिसमे हम परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त एक या दो अन्य व्यक्तियों का भोजन अतिरिक्त बनाते या बनता है।क्योंकि हमारी धारणा रही की हमारे घर पर कोई भी सन्यासी,साधु,मेहमान,भूखा आदमी किसी भी वक्त पर आ सकता है और आया हुआ कोई भी इंसान भूखा न जाए।अगर कोई घर पर नहीं आता तो बचा हुआ खाना हमारे घर के पशुओं को जैसे गाय,भैंस,बैल,कुत्ता आदि को दे दिया जाता था।अगर अपने नही है तो पड़ोस वालों के पशुओं को दे दिया जाता था।ऐसा प्राचीन काल से ही चलता आ रहा था।धीरे धीरे प्रगतिशील वातावरण और विकासशील धारणा हमे शहर ले आई।जाहिर सी बात है शहर अपने आप तो नही बसें होंगे। एक स्थान पर कुछ परिवारों का समूह रहता होगा,फिर वहां अन्य परिवार के लोग आकर रहने लगे।धीरे धीरे कई आयाम विकसित होने लगे जिससे लोगों में आकर्षण ,उपयोगिता, एवम उच्चतम जीवन शैली की लालसाओं ने गांव को नगर,नगर को शहर में परिवर्तित कर दिया।इन सभी गतिविधियों के बीच आदमी अपनी संस्कृति से जुड़ा रहा,कुछ भ्रांतियों को छोड़कर।खासतौर पर खाना बनाने वाली कला।आम तौर पर इसे वर्तमान समय में भी समझा जा सकता है। एक परिवार जो की गांव से शहर में जाकर बसता है।अब वहां वह अचानक अपनी जीवन शैली आसानी से जो हो जाए परिवर्तन बहुत जल्द कर लेता है।पर कुछ ऐसी भी क्रियाएं होती है जिनमे परिवर्तन जल्दी न होकर धीमे गति में होता है।इस धीमे गति में होने वाला परिवर्तन खाना बनाना भी सम्मिलित है।जब आदमी यह समझ जाता है की बचा हुआ खाना कूड़े में ही फेकना है,न कोई जानवर या पशु को दे सकता है,न किसी अन्य व्यक्ति को भोजन करा सकता है, एक तरह से पैसे की और अन्न देवता का अपमान हो रहा है ,तब जाकर उस परिवार में नाप तौल कर खाना बनना प्रारंभ हो जाता है।अब आप सोचिए हम भारतीय लोग जिस भोजन को सर्वप्रथम भगवान को अर्पित कर और देवतुल्य मानते है उस भोजन को कूड़े में फेकना हमको कैसा लगेगा। हां यह भी सत्य है की ऐसे लोग भी होंगे जो इन तथ्यों से समर्थित नहीं होंगे और भोजन की बरबादी करते होंगे।पर मेरा मानना है की जिस भी व्यक्ति पर भारतीय संस्कृति की हल्की सी भी छाप पड़ी है वो ऐसा नहीं कर सकता है।भारत एक कृषि प्रधान देश है जिसे पूरी दुनिया जानती है और अन्न उत्पादन में हमारी गिनती हमीं से ही शुरू होती है।लेकिन फिर भी अपने भारत में ऐसे कई लोग है जो की भूखे पेट या एक वक्त का ही भोजन खा पाते है।लेकिन इसकी वजह मैं खाना बर्बादी को नहीं मानता।
हमे बचपन में सिखाया जाता था की रोका टोकी नही करना चाहिए,जब कोई व्यक्ति कोई काम कर रहा हो या नए कार्य की शुरुवात कर रहा हो,या घर से बाहर निकलने की तैयारी कर रहा हो। हमें रोका टोकी दुबारा शुरू कर देनी चाहिए ,जब समाज में या अपने आस पास ,कहीं भी खाना या भोजन की बरबादी देखते समय या लोगों को ऐसा करते हुए।
भारतीय संस्कृति की पहचान या समझ केवल और केवल भारतीय ही नही बल्कि अन्य संस्कृति के लोग भी कर सकते है ,बस गहराई तक पहुंचने की जरूरत है
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