अपनी अपनी दुनिया

अगर दुनिया शब्द के भाव या अर्थ को समझते है तो पृथ्वी पर बसी पूरी मानव जाति या पूरा ब्रह्मांड आ जाता है।जिसमे सम्पूर्ण गतिविधियां शामिल होती है।दुनिया शब्द जितना आसान है बोलना हमारे लिए उतना ही मुश्किल है समझना।हम आमतौर अपने जीवनचर्या में आए दिन दुनिया का जिक्र किसी न किसी मौखिक संस्करणों में करते रहते है,कहने का मतलब हम सभी मानव जाति के ऐसे कई पक्षों का जिक्र करते है जिन्हे न तो हम जानते है और न ही परिचित होते है ,पर फिर भी हम उनसे,प्रेरणा ,प्यार,आशा,नफरत,आदि भावों का प्रदर्शन करते या रखते है।ऐसा क्यूं?  क्योंकि अपने साथ हम उन्हें भी अहसास कराने का प्रयास करते है की हम सभी एक ऐसी दुनिया का हिस्सा है ,जोकि परिवर्तन शील ,प्रगतिशील है तथा इसी क्रम में हम अपने मानवीय मूल्यों की रक्षा कर सके और नकारात्मक दृष्टिकोणों की अवहेलना करने का प्रयास करते है ताकि आने वाली समाज को सकारात्मक प्रगतिशील माहौल मिल सके।
लेकिन इस मानव समाज में दुनिया के अपने अपने अर्थ है ,दायरा है,प्रभाव है,कार्यशाला है या इसके  कई पहलू है जिनमे सिमट कर या निर्धारित क्षेत्र तक ही सीमित होता है।जैसे प्रारंभ में जब मानव जन्म लेता है तो उसकी दुनिया केवल मां होती है, हालांकि पैदा होते ही वो मानव समाज के एक नए सदस्य के रूप में शामिल भी हो जाता है,पर केवल सांख्याकिक तौर पर ही।धीरे धीरे जैसे मानव अपने प्रौढ़ अवस्था में आता है ,तब तक उसका अपने परिवार सदस्यों, निकटम रिश्तेदारों,संबंधियों और दोस्तों के बीच आना जाना शुरू हो जाता है ,जिसके साथ उसके दुनिया का विस्तार होता चला जाता है या उसकी दुनिया में नए सदस्यों का जुड़ाव शुरू हो जाता है।ठीक इसी प्रकार जब मानव युवावस्था तक अपनी दुनिया को विस्तारवादी विचारधारा के तहत बढ़ाता चला जाता है।जिसका उसे कोई पूर्वज्ञान नही होता।उसके बाद जब वह सांसारिक अर्थात पारिवारिक जीवन की सीढ़ी चढ़ता है तो उसकी दुनिया को प्रभावित करने वाले सदस्यों का आगमन होना शुरू हो जाता है जिसे हम बीवी,बच्चो आदि से आसान से समझ सकते है।मानव अपने कार्यकाल के अनुभवों के अनुसार अपनी दुनिया का विस्तार और सीमित करता है।विस्तार से अभिप्राय है मानव जब एक स्थान से दूसरे अलग अलग स्थानों पर विचरण करता है ,चाहे घूमने की दृष्टि से,चाहे कार्य की दृष्टि से,चाहे सीखने की दृष्टि से ।मानव जब इन सभी अलग  अलग प्रकार की संस्कृति,व्यवहारिक वातावरण में जाता है तो उनसे कुछ सीखता है और कुछ अपनाता भी है और कुछ अपनी छाप भी छोड़ता है।जिससे उसका मानवीय बौद्धिक क्षमता का विकास होता है और वह समाज को अलग नजरिए से देखता है और अपनी दुनिया के ज्ञान को बढ़ाता तो है ही साथ में उस नए समाज को अपनी दुनिया में शामिल भी करता चला जाता है।इन सभी स्थिति में मानव की दुनिया उससे जुड़े लोगो ,तथ्यों,नियमो,संबंधों,आयामों आदि सभी प्रकार की क्रियाएं जो की उससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुईं होती है , वही उसकी वास्तविक दुनिया होती है।जिसमे व्यवहारिक तौर पर इसका स्वरूप घटता और बढ़ता रहता है। कम ,ज्यादा, कम इसी क्रम में अधिकांश मानव जाति की दुनिया का क्रम चलता है।मानव की अपनी दुनिया उसके स्वयं के विचार,बुद्धि,विवेक और निर्णय क्षमता पर ही आधारित होता है।
वर्तमान में मानव की दुनिया के स्वरूप में विस्तार हुआ है।आजकल इतने आयाम या माध्यम हमारे आस पास बल्कि हमारे हाथों में मौजूद है जिनके द्वारा हमने अपनी दुनिया का विस्तार बहुत ही तेज गति से किया हुआ है या कर रहे है।इन माध्यमों ने हमारे गांवों,  शहरों,नगरों,जिलों,राज्यों तथा देशों की सीमाओं को एक स्तर पर कायम कर दिया है।
 वर्तमान मानव दुनिया की स्थिति को देखते हुए एक समस्या सबसे प्रभावित करने वाली आ रही है जोकि मानव की बाहरी व्यवहारिक भावों को प्रमुखता देता जा रहा है।हम अपने आंतरिक भावों को अंदर ही समाप्त या दबा रहे है।उदाहरण के लिए ऐसा हम हास्यप्रद , उल्लेहना, रोमांच आदि घटना के स्थिति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए तत्पर रहते है। क्योंकि हमे इसका बिलकुल ज्ञान नहीं होता की अन्य लोगों पर इसका क्या प्रभाव या संदेश पड़ेगा। इस वैज्ञानिकता से भरे दौर में जहां हम अधिकतर भौतिक संयंत्रों , इलेक्ट्रिक साधनों , इंटरनेट जैसे माध्यमों पर आश्रित होते जा रहे है ।जिसके चलते अक्सर यह अनुभव करते है की प्रत्येक व्यक्ति अपनी एक दुनिया हाथों में लिए घूमता है। हाथों में लेकर घूमने का अर्थ है मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर ,इत्यादि है ,जिसके द्वारा इंटरनेट का प्रयोग कर हम अपनी अपनी दुनिया से जुड़ते है या एक नई दुनिया बनाते है और वर्तमान में युवा पीढ़ी की विश्वस्ता इस पर अधिक बढ़ती जा रही है। व्यवहारिक दुनिया से ऐसे लोग दूर होते जा रहे है जिससे आज की पीढ़ी में आत्मविश्वास , अनुभव , संयम , कुशलता , संवेदना जैसे भावों की कमी आसानी से देखी जा सकती है।इसमें सुधार की अत्यंत आवश्यकता है और इसके लिए सबसे आवश्यक है समय सारणी, अर्थात् केवल आवश्यकतानुसार ही ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल करना , उनका भोगी न हो जाना।इसका ये अर्थ नही है वो सभी लोग ऐसे उपकरणों से दूरी बना ले जिनसे आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।
एक कहावत है जो शायद सभी ने अवश्य सुनी होगी , पहले इस्तेमाल करे फिर विश्वास करे , ये धारणा वर्तमान में केवल नाममात्र ही रह गई है। मानवीय सरंचना में व्यक्ति अन्य व्यक्ति के व्यवहारों, विचारों, कार्यो के बारे जानने , समझने से पहले ,पूर्वगामी छवि बना लेता है और उसी के अनुसार व्यवहार करता है।हम सभी कभी न कभी किसी व्यक्ति से संबंध स्थापित करने से पूर्व उस आदमी से जुड़े सभी पक्षों पर विचार अवश्य करता है ,फिर चाहे वो समाज में व्याप्त उससे जुड़े किस्से, कहानी , व्यवहारिक गुण, उसकी प्रकृति , भाषा ज्ञान , आर्थिक स्थिति, राजनीतिक स्थिति, सामाजिक स्थिति , मनोस्थिति आदि का अवलोकन करते ही है और उसी के अनुसार ही हम उससे प्राथमिक व्यवहार का अनुसरण करते है  किंतु यदि एक से अधिक जितनी बार हम उस व्यक्ति से मिलते है या व्यवहारिक प्रतिक्रियाओं का आदान प्रदान करते जाते है , उतना ही अधिक हम उस व्यक्ति को पहचानने लग जाते है अर्थात उसके मानवीय और सामाजिक आयामों के बारे में सही अनुमान लगा सकने के काबिल हो जाते है , साथ ही हमारे नजर में पूर्व में स्थापित छवि में भी बदलाव या यथास्थिति की गणना करने में समर्थ बन जाते है।
हम अपने वास्तविक संस्कृति जोकि सबसे प्राचीन और सबसे उत्तम संस्कृति है उसकी अनदेखी करते जा रहे है ,क्योंकि हम चकाचौंध से घिरे हुए समाज में रह रहे है, जोकि स्थाई नहीं है।हम जिस संस्कृति में पले बढ़े है या जिसे मानते आ रहे है उसमे स्थायित्व, विकास, सभ्य और सकारात्मक दृष्टिकोण को प्रमुखता देता है।
किसी भी दुनिया की एक सीमा होती है जिसे उसकी संस्कृति , परंपराएं, मान्यताएं, मानवीय दृष्टिकोण , सुरक्षा प्रणाली , वातावरण , पर्यावरणीय स्थिति आदि कई महत्वपूर्ण घटक निश्चित करते है।एक विशेष प्रकार के पर्यावरणीय भौगोलिक स्थिति में निवास करने वाली मानवीय सरंचना द्वारा उन सभी आवश्यक पहलुओं का ध्यान रखती है और अनुसरण करती है जिससे उनकी पहचान स्थापित हो सके। 


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