उच्च संस्कृति -श्रेष्ठता की होड़

पहचान से हम आम तौर पर हम लोग यही लेते है की हम हमारे आस पास के लोग जानते है और पहचानते है।पहचान इस अर्थ में केवल हम अपने खुद की ही मानते है या इसपर अधिक ध्यान देते है।व्यक्तिगत पहचान सबसे प्रमुख होती है हमारे लिए क्योंकि हम जिस समाज ,वातावरण या माहौल में रहते है कोई हमे हमे अगर पहचाने ही नहीं तो फिर आपमें कोई बात नही या आपने इसकी आवश्यकता नहीं समझी ।व्यक्तिगत पहचान भी किसी भी स्थाई निवास में आवश्यक होता है और आदमी इसी के अनुसार ही काम करता है।खैर आदमी अपनी सभी गतिविधियां अपने और अपने से जुड़े व्यक्तियों , सदस्यों , परिवार आदि की जरूरत , सुरक्षा , मदद के लिए अपनी पहचान को बनाता है फिर चाहे वो सीमित क्षेत्र हो या वृहद क्षेत्र।
वही इसके अलावा पहचान की एक अलग स्तर या क्षेत्र है जोकि शायद ही कोई ध्यान देता है । मैं जिस पहचान की बात कर रहा हूं वह है आपके समाज , संस्कृति की पहचान।उदाहरण के तौर पर अगर आप एक उत्तर भारतीय है और भोजपुरी समाज से आते है और आप अपने आर्थिक कारणों से कही अलग क्षेत्र जैसे मुंबई ,महाराष्ट्र जैसे क्षेत्र में विस्थापित हो गए है तो आपको अपनी संस्कृति ,भाषा व्यवहार आदि को सीमित करना पड़ता है या समकालीन संस्कृति के अनुसार व्यवहार करना पड़ता है।इसे हम एक और तरीके से समझ सकते है जैसे जब आप अपने समाज , संस्कृति को छोड़कर भले ही कुछ समय के लिए ट्रेन , बस आदि जैसे परिवाहनो में सफर करते है वही से ही आप अपने वास्तविक छाप, संस्कृति, भाषा व्यवहार को धीरे धीरे सीमित करते चले जाते है। इसके अलावा वर्तमान समय में पूरे भारत में ऐसे कई आधुनिक शहरों में आप अपनी भाषा, व्यवहार आदि को व्यवहारिक रूप देकर जीवन जी सकते है , बस आपके व्यवहार ,भाषा , संस्कृति से अन्य समाज के लोगों को नुकसान न हो रहा हो।यह भी धीरे धीरे ही स्थापित हुआ है ।देश बड़े बड़े शहरों में ऐसे समाज बसे हुए है जो दोहरी संस्कृतियों, परंपराओं को मानते है।
हमारा भारत जैसे की सबको पता है की सांस्कृतिक विभिनित्ताओ का देश है।यहां इतनी संस्कृति के लोग रहते है की तय कर पाना मुश्किल होता है की कौन किस संस्कृति से संबंध रखता है।इन सबके अलावा हमारे भारतीयों में सबसे प्रमुख गुण समायोजन और सभी संस्कृतियों के प्रति सम्मान की भावना ही एकता के बंधन में बांधती है।लेकिन अगर आप व्यवहारिक तौर पर नजर डालेंगे तो भारत में प्रत्येक समुदाय , धर्म , संस्कृति का अपना अपना प्रभाव रहता है जिसका अनुभव आप केवल व्यवहारिक प्रक्रिया द्वारा ही समझ सकते है। 
मेरे हिसाब से भारत में सबसे प्रभावशाली संस्कृति , समाज सिख समुदाय है ।एक दक्षिण भारतीय युवा उत्तर भारत में आकर या विचरण करते हुए , ट्रेन में ,बस में ,पार्क में इतनी तेज आवाज में जिससे किसी को समस्या न हो पंजाबी गाने आराम से बजा सकता है लेकिन इतनी ही आवाज में वह तमिल, तेलुगु , कन्नड़ आदि भाषाओं के गाने बजाने में अपने आपको असहज महसूस करेगा ।ऐसे ही कोई उत्तर भारतीय खासतौर पर उत्तर प्रदेश का अवधि आदमी तमिलनाडु जाकर सार्वजनिक क्षेत्र जैसे पार्क, बस स्टेशन , ट्रेन स्टेशन पर अपनी भाषा यानी भोजपुरी गाने बजाने में अपने आपको असहज महसूस करेगा , भले ही उसे भोजपुरी गाने सबसे प्रिय हो तो क्या? लेकिन वही आदमी अगर पंजाबी गाने आसानी से बजाकर सुन सकता है।ऐसा सभी समाज, संस्कृति के लोगों के साथ होता है , लेकिन सिख समुदाय के लोगों के साथ बहुत कम या नाममात्र ही।ऐसा क्यों कभी सोचा आपने या कभी विचारा।पंजाबी ,गुजराती , मराठी, बंगाली , तमिल , तेलुगु , भोजपुरी आदि समाज अपने राज्यों, भाषाओं और अपनी संस्कृति के अनुसार ही प्रसिद्ध है और भाषा, संस्कृति, व्यवहार ही उनकी अन्य राज्यों के लोगों के बीच मुख्य पहचान होती है।
आपकी संस्कृति, समाज का प्रतिनिधित्व आपके समाज के नेता, राजनेता, कलाकार, लेखक, विचारक , विशेषज्ञ आदि ही करते है।आपके समाज , राज्य , भाषा को अधिक से अधिक प्रचार प्रसार करने या अपने समाज , संस्कृति व्यवहार, भाषा को अधिकतम लोगों तक पहुंचाने में जितना अधिक योगदान आपके समाज , संस्कृति के लोगों का होगा उतना ही सम्मान आपके प्रति लोगों में होगा। भारत की वर्तमान स्थिति के बारे में बात करे तो गुजराती समाज , संस्कृति से हमारे प्रधानमंत्री जी और गृह मंत्री अमित शाह जी आते है जिन्होंने विश्व स्तर पर छाप छोड़ी है। 

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