अनुभव-गणेश चतुर्थी

गणेश चतुर्थी से हमारा ध्यान अधिकतर गुजरात, महाराष्ट्र , खासकर मुंबई की ओर चला ही जाता है।खैर आज के समय में लगभग सभी राज्यों, क्षेत्रों में गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाए जा रहे है।सिंपल में कहे तो सीमित एरिया से निकलकर गणेश जी का एरिया काफी बड़ा हो गया है।साधारणतः भारत के सभी राज्यों के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पूजा विधि में गणेश पूजा सबसे पहले की ही जाति है।गणेश चतुर्थी के समय मुझे एक घटना अवश्य याद आती है। मैं ग्रामीण इलाके से संबंध रखता हूं तो जाहिर ही है की वहां मेरे दोस्त, रिश्ते, जानने पहचानने वाले अवश्य है।हमारे गांव में लगभग सभी स्तर के , सभी समुदाय के लोग रहते है, उसमे मुस्लिम भी है।मेरी गांव में गांव वालों से सबसे प्यार ,सम्मान ,संवेदनशील रिश्ते कायम है। सभी समुदाय के लोग एक दूसरे के कार्यक्रमों में शामिल होते है और सहयोग भी करते है।एक दिन हमारे यहां गौरी गणेश की पूजा थी, हमारे रफीक चच्चा भी आए आरती के समय।  मैं उनके बगल ही जाकर खड़ा हुआ और आरती गुनगुनाने की एक्टिंग करने लगा, जबकि वही चच्चा बुलंद आवाज में गणेश जी की आरती गा रहे थे।आरती के बाद प्रसाद देते हुए मैने चच्चा को बोला आपसे मुझे कुछ पूछना है, तो आप बैठो अभी 5 मिनट में आता हूं, फिर बात करता हूं। चच्चा मेरा इंतजार कर रहे थे की मैं कब निकलू घर से , कुछ देर बाद वो अपने घर चले गए।बाद में मुझे याद आया तब मैं अपने सवालों के जवाब के लिए चच्चा रफीक के घर गया।वो अपने पारिवारिक घर से एक अलग  50 मीटर दूर आवास पर लेटे थे, मच्छरदानी लगाए हुए।मैने उन्हे जगाया रात को साढ़े दस बजे।उन्होंने कहा मुझे पता था तुम जरूर आओगे, शायद वो मुझे जानते थे, मतलब मेरे व्यवहार, प्रकृति से परिचित है।उन्होंने कहा  बोलो क्या बोलना है?
मैने बोला ये तो पता है की आप आपने कई साल बंबई में बिताए है, दुकान चलाए है।और आपको गणेश आरती भी याद है , इसके पीछे क्या कहानी है या आप सही में गणेश जी को मानते है या दुनिया के दिखावे में ये सब....
रफीक चच्चा... अ रे क्या कुछ भी बोलते हो, माना तुमने दुनिया घूम ली है ,ज्यादा मॉडर्न हो गए हो पर ऐसा कुछ मत बोलो की दिखावे के लिए कोई क्यों करता है।
कहानी वानी कुछ नही है हमारा विश्वास है भगवान पर फिर चाहे अल्लाह हो वो गणेश जी हो, राम हो या कृष्ण जी हो। भाई इसी दुनिया में हम भी रहते है।रही गणेश जी की पूजा मैने कई साल लगातार मूर्ति रखकर की है जब तक हम बंबई में रहे।शादी के 2 साल बाद हम बंबई चले गए थे अपने रिश्तेदार के पास, जो वहां पहले से कम करते थे।पढ़ा लिखा तो कुछ थे ही नही ,केवल लिखना पढ़ना जानते थे।तो अच्छी नौकरी मिलने से रही इसलिए अपने पेशे वाला काम बाल कटिंग के दुकान पर नदीम रिश्तेदार ने लगवा दिया था।अच्छा जो दुकान मालिक जो थे वो मारवाड़ी थे, महीने में हमको 1800 रुपए मिलते थे।1.2 साल बीतने के बाद, सब कुछ सीखने के बाद दुकान मालिक हमको मानता बहुत था।अच्छा वो गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की मूर्ति दुकान में भी रखते थे, फिर 8 से 10 दिन बाद उसे विसर्जन भी करते थे।हमलोग भी उसमे पूरी मेहनत से लगते थे। मैं अधिकतर लड्डू खाने में ज्यादा मन लगता था और बंबई की रौनक दही हांडी और गणेश विसर्जन पर तो ऐसा था की वैसा माहौल कही नही मिलेगा।1991 में दुकान मालिक ने वो दुकान मुझे बेचने को कहा और वो भी 10000 में ही।मैने किसी तरह गांव से भी पैसे मंगवाए और दुकान खरीद ली।अब दुकान का मालिक बन गया।दुकान खरीदने के 3 4 महीने के बाद पता चला की दुकान जोकि घाटकोपर के अंबे नगर रोड के मेन सड़क पर थी और पीछे झुग्गी झोपड़ी वाला एरिया है वो भी टूटने वाला है, यहां बिल्डिंग, माल्हा बनेगी। अब ये खबर सुनते ही हम बहुत घबरा गए थे और सोचने लगे की हमर किस्मत इतनी खराब है या फिर दुकानदार वाले ने हमको,बेवकूफ बनाया है।ब्याज पर पैसे उठाकर हमने दुकान खरीदी थी।अब जाए तो कहां जाए।अगले दिन गणेश चतुर्थी थी।तो मुसीबत के समय भगवान, अल्लाह, पीर, फकीर, साधु , संत पर विश्वास बढ जाता है , इस बार हम अपने पैसों से गणेश जी की मूर्ति लेकर आए और दुकान में स्थापित किया।दुकान ही हमारा घर था क्योंकि दिन में काम करना और रात में बना खाकर वही रहना यही था और वो भी अब टूटने वाला है इस खबर ने हमारी नींद उड़ा रखी थी ।जिसके वजह से हमारी आस्था गणेश जी भगवान के प्रति अधिक हो गई थी। उस हफ्ते में गणेश जी की पूजा ऐसे की जैसे शायद ही कोई करता हो।बिना नहाए धोए मूर्ति को न छूना, मन में बस यही शब्द गुजते थे की गणेश जी अब बस आपका सहारा है ,जो कर सकते हो आप ही कर सकते हो, हमारे साथ साथ आप अपना भी घर टूटने से बचा सकते हो।विसर्जन के दिन हमने गणेश जी की मूर्ति विसर्जित नही की और तब तक हमे कुछ आभास होने लगा की अब जोभी होगा अच्छा होगा क्योंकि मैंने बड़ी शिद्दत और बड़े आरजू के साथ गणेश जी की पूजा की थी। 2 महीने बाद दुकान पर नोटिस लेकर कोई अधिकारी आए और हमे एक कागज दिया।हमने पूछा ये क्या है साहेब? हम ज्यादा पढ़े लिखे नही है आप खुद ही पढ़कर बता देंगे तो आपकी बड़ी कृपा होगी।हमने उनके लिए चाय मंगा दी। साहेब ने बताया की आपकी दुकान के साथ साथ पीछे झुग्गी झोपड़ियां टूटेगी और इनकी जगह बड़ी बड़ी बिल्डिंग बनेगी, जिसमे इनके वास्तविक मालिक को इसके बदले घर दिए जायेंगे और तुम्हे दुकान मिल जायेगी।चाय की जगह मिठाई खिलाना चाहिए तुमको। ये सुनते ही हमारा तुरंत ध्यान गणेश जी भगवान पर गया ,हमने मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर धन्यवाद किया और सबसे पहले लड्डू उन्हे चढ़ाने का वादा किया। साहेब को सारी कहानी भी बताई क्योंकि अब हमारे सामने ये भी एक समस्या थी की अब करेंगे क्या , कहां दुकान करे, या मजदूरी करे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। फिर उन साहेब ने हमारा सारा वृतांत सुनकर हमारी मदद की ओर सड़क के उस पर वाले इलाके में हमे दुकान किराए पर दिला भी दिया। हमको उस गणेश जी की मूर्ति से इतना लगाव हो गया था की हम अगले साल के विसर्जन के समय हमने रोते हुए मूर्ति को विसर्जित किया।
मैंने पूछा क्यों किया विसर्जन, एक साल में बदल गए थे क्या?
फिर चच्चा ने कहा नही भई हमको हर कोई बोलता रहता था ,तुम्हे विसर्जन कर देना चाहिए , इतनी दिनों तक नहीं रोकना चाहिए। जो भी हिंदू भाई जानने वाले आते थे हमको बोलता था, इसलिए हमने विसर्जित कर दिया।अब क्या था उस समय हमारी जरूरत थी या पता नही , पर विश्वास मानो दुकान मालिक को ये पता था की टूटने वाली है, वो जानबूझकर हमको बेच दिया था दुकान, लेकिन पहले घर के बदले घर, दुकान के बदले दुकान मिलने का नही था , ये बाद हुआ था ,पता नही कैसे? हमने कभी जानने का कोशिश भी नही किया। पर इतना जरूर है हमारी आस्था गणेश जी तब से लेकर आज भी है, बस अब दिखावा नहीं करते ,हमारा दिल से दिल का जुड़ाव हो जाता है और हां तब से लेकर फिर कभी हम गणेश जी की मूर्ति घर में स्थापित नही किए, अब सिर्फ मन में ही स्थापना और विसर्जन हो जाती है।हस्ते हुए।

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