व्यवहार- आज का
कोरोना को आए दो साल से भी अधिक हो चुके है लेकिन फिर भी अभी लोगों के दिलों में इसका डर एकदम गया नहीं है. इस दौरान आप सभी ध्यान तो दिया ही होगा की हमारे जीवन में क्या क्या बदलाव हुए है या होते जा रहे है.खैर हम जिस मानवीय समाज का हिस्सा है , जो प्रत्येक परिस्थिति के अनुसार अपने आप को उसके अनुरूप ढाल ही लेता है।
आज के माहौल के हिसाब से बात करे तो आप सभी ने अपने स्वयं या अपने आस पास रहने वाले लोगो के व्यव्हार , प्रतिक्रियाओं के बारे में ध्यान दिया है क्या ? साधारणतः हम सकारात्मक चीजों को ध्यान में रखते है , नकारात्मक चीजे पर कम ध्यान जाता है या जानकर हम इग्नोर करते है, छिपाते है आदि कई तरीकों से नकारात्मक चीजों को ढकने का प्रयास करते है, खासकर ऐसी जगह जहाँ आपकी इमेज पर कोई चारित्रिक , व्यावहारिक,आर्थिक ,सामाजिक प्रभाव पड़ने का डर हो।ऐसा लगभग सभी करते है , मैं भी क्योंकि मैं भी इसी समाज का हिस्सा हूँ।
मेरे विचार या अनुभव के आधार पर ये पूर्ण रूप से कह सकता हूँ की किसी भी कार्य , घटना की आप जितने मर्जी तैयारी कर ले लेकिन घटना या कार्य के पुरे होने के बाद ही हमें उसकी महत्ता , उपयोगिता अधिक समझ आती है और उसके बाद हम उसका अधिक विस्तारपूर्वक विश्लेषण दे सकते है. सिम्पल में कहे तो किसी कार्य के पूर्व का अनुभव और कार्य के समापन के बाद का अनुभव सबसे अलग होता है और हम कार्य के समापन का अनुभव के आधार पर ही उस कार्य के समानांतर कार्यों की पूर्व अनुमान बनाते है या तैयार करते है। इस पर एक अलग नोट लिखूंगा क्योंकि आज का मेरा विषय है मानवीय व्यव्हार में बदलाव , खासकर सामाजिक दृष्टिकोण आधार पर।
देखिये लॉकडाउन के दौरान हम सभी किस तरह रहे है ,ये बताने की जरुरत नहीं है , लेकिन मोटे मोटे बिंदुओं पर एक नजर जरूर डालते है। हमारा मानवीय समाज का सीमित क्षेत्र यानि घरों तक ही सीमित रहना, सीमित लोगों से मिलना जुलना , जीवन सुरक्षा का डर ,आर्थिक संकट , भविष्य की गंभीरता , अधिक संवेदनशीलता , सेटेलाइट उपकरणों पर अधिक निर्भरता आदि ऐसी कई प्रभावकारी गतिविधयों से होकर गुजरे है और वर्तमान जी रहे है. वर्तमान में भी हम अपने पहले जैसे दैनिक गतिविधयों से जुड़ गए है और निरंतर प्रयत्नशील है अपने सपनो , आशाओं , इच्छाओ, प्रगति और विकास को पूरा करने के लिए। इन सभी के बीच में हमने खास ध्यान नहीं दिया की हम जिस सामाजिक दौर में जी रहे है उसमे हमारी भागीदारिता क्या है और हमारा क्या कर्तव्य है जोकि हमें एक व्यक्ति से सामाजिक व्यक्ति की पहचान देता है। हमारा व्यवहार ही हमारी सामाजिक पहचान बनाने या विकसित करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है।
आजकल हम अक्सर खबरों के जरिये , अपने आस पास , अपने से जुड़े लोगों में , यहाँ तक स्वयं में भी देखते है की वर्तमान में हमारी व्यवहारिक गतिविधि में सबसे अधिक बदलाव आया है वो भी नकारात्मक दृषिकोण का प्रभाव अधिक नजर आता है। बीते एक दो महीने के भीतर ऐसे कई घटनाये देखी , सुनी याअनुभव किया होगा की लोग छोटी छोटी बात पर हाइपर हो जाते है, हाथा पाई करने लग जाते है और अभद्र शब्दों का प्रयोग करने लगे है। अगर सामने वाला कमजोर है तो हाथ उठाने में देरी भी नहीं करते , फिर चाहे वो किसी उम्र ,लिंग का हो। हमारी भारतीय संस्कृति की सबसे अच्छी बात संस्कार है , जिसे शायद हम भूलते जा रहे है। महिला पर हाथ उठाना , अपशब्द कहना , सिक्योरिटी गार्ड को मारना , बुजुर्ग को मारना , बच्चो को मारना , ऐसी कई घटनाये रोजाना आपको टीवी, अख़बारों और सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर आसानी से दिख जाएगी।
ऐसा क्या हुआ है जो हम इतने उत्तेजक हो गए है। लॉकडाउन से ही हमारी निर्भरता सिमित हो गयी है खासकर सामाजिक स्तर पर। हम लोगों से मिलने जुलने , बातचीत करने , अपने विचारों का आदान प्रदान व्यवहारिक तौर पर न करके केवल सोशल मीडिया जैसे माध्यमों को ही सर्वोपरि रखने लगे है। यहाँ तक की हम अपने परिवार में ही केवल काम चलाऊ शब्दों का प्रयोग कर अलग कोने में बैठकर मोबइल , लैपटॉप आदि के जरिये अपनी दुनिया में खो जाते है। आपको ये अच्छा भी लगता है क्योंकि हमें लगता है की इस दुनिया के आप मुख्य किरदार हो , यहाँ कोई रोक टोक नहीं है , न बोलने में , न लिखने में , न पहनावे में , दैनिक गतिविधिया जो भी हो व्यवहारिक छोड़कर बाकि आप सबकुछ कर सकते हो यहाँ। साधारण सी बात है हिंदी वाला दिल्ली का आदमी केरला के किसी ऐसी जगह जाकर, जहाँ हिंदी किसी को आती नहीं, वहां वो हिंदी बोल कर अपनी भावनाये, मनोदशा या आवश्यकताएं पूरी नहीं कर सकता क्योंकि इसके लिए उसे इंग्लिश या राज्यीय भाषा बोलना ही पड़ेगा और अगर उस स्थिति में अगर आपका सामाजिक व्यवहार , संस्कार अच्छा है तो कोई न कोई मदद कर देगा। ऐसा इसलिए क्योंकि आपने सामाजिक व्यवहारिक जीवन जिया है। जो लोग सोशल मीडिया वाली दुनिया या समाज के हिसाब से अपने व्यवहारिक दुनिया में व्यवहार करते है , अक्सर उन्हें परिस्थिति ज्ञान नहीं होता या कम होता है और उसी के हिसाब से वो अपनी क्रिया और प्रतिक्रिया करते है।
मैं जनता हूँ वो कोई नहीं , मैं सही हूँ खासकर अपने आपको सर्वोपरि रखने वाली सोच का विकास अधिक हुआ है , कोरोना महामारी के बाद से।लोगों में स्वीकारने की क्षमता का ह्रास हो रहा है। हम दुसरो के द्वारा किये हुए कार्यो , अपनी गलतियों , दूसरों के विकास , ख्याति को स्वीकार करने में अपने आपको असहज महसूस करते है। व्यावहारिक जीवन में हम अपने जीवन से जुड़े सभी लोगों से सकारात्मक व्यवहार करते ही है या कोशिश करते है की हमसे कोई नाराज या उदासीन न रहे फिर चाहे वो परिवार के लोग हो, कार्यक्षेत्र के लोग हो ,मित्रगण हो, रिश्तेदार के अलावा कुछ ऐसे लोग जिनका आपके जीवन में मात्र नाम की भूमिका हो जैसे दूधवाला,सब्जीवाला , सफाईवाला आदि ऐसे लोगो से किस तरह के व्यवहार रखने चाहिए ,किस तरह के नहीं ये सब हम अपने सामाजिक व्यवहार के तौर पर ही सीखते है , वो भी अनुभव के साथ लेकिन अन्य माध्यमों के जरिये ये सब सिख पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
आजकल लोग कहे या हम लोग एंकाकी जीवन पर अधिक विश्वास करने करने लगे हैं। एंकाकी का मतलब स्वयं को केंद्र में रखकर सभी चीजों , विचारो , घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया करना। जबकि ऐसा नहीं होता हैं। कोई व्यक्ति अकेले कुछ भी नहीं कर सकता , अगर आपने कुछ ऐसा किया है जिसमे आपको लगता है की किसी ने मदद नहीं की है आपने जो किया है अकेले किया है और जो आपके नजर , परिवार के नजर या समाज के नजर में बहुत ही सम्मानजनक है तो उसमे सिर्फ आपका रोल नहीं है , हो सकता है की उसमे ऐसे लोगों का सहयोग रहा हो जिन्होंने आपके लिए वातावरण तैयार किया हो। सबको साथ चलने की केवल हम आजकल बात करते है और हम अकेले आगे निकलना चाहते है। ऐसा कुछ मानवीय गुणों की वजह से भी हो सकता है , लेकिन केवल अपने विकास को हम समाज का विकास नहीं कह सकते।
सांस्कृतिक , पारम्परिक और धार्मिक बंधनो को अक्सर हम ढोंग या आडम्बर के रूप में ही लेते है , खासकर आजकल की युवा पीढ़ी। जोकि साइंस , टेक्नोलॉजी पर विश्वाश करती है। समाज को एकरूपता के बंधन में बांधने और संघठित पहचान कायम करने में भारतीय संस्कृति और परम्परा का काफी हद तक योगदान है। मानवीय गुणों में एक गुण ये भी है की हम चमकती हुई चीज के प्रति आकर्षित जल्दी होते है , जिसके चलते हम पश्चिमी सभ्यता , कल्चर के प्रति अधिक आकर्षित हुए है वो उसी मार्ग पर बढ़ते चले जा रहे है।
वर्तमान समय के लोगों में संतोष की भावना ख़त्म होती जा रही है। वैसे अलग ही विषय है जिसपर एक अलग व्याख्यान लिखने की कोशिश करूँगा लेकिन भी संतोष की भावना से अभिप्राय है सब्र से है।सब्र ऐसी चीज है जिसकी कमी से हमें अन्य नकारात्मक विचारो और भावनाओ का विकास अधिक होता है जैसे गंभीर , उत्तेजक , उदासीनता , असंतुष्टि , उम्मीद , अविश्वास आदि।
आजकल के लोगों के व्यवहार में आये बदलाव के लिए इनके आलावा अन्य चीजे भी मायने रखती है जोकि राजनितिक , सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक और शारीरिक पहलु भी शामिल है , पर उससे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है की इसमें हम स्थिरता कैसे लाये या ऐसी नकारात्मक व्यव्हार को सकारात्मक दृष्टिकोण में कैसे बदले। इसका सबसे सरल और उत्तम उपाय है की आप लोगों के बीच में बैठे उठे , अपने सवालों, उलझनों को साझा करे , अन्य लोगों की बाते सुने।अन्य लोगों के अनुभवों से सीखे , उनकी मनोदशा पहचाने आदि। इन सबके लिए आपको सबसे शुरुवात परिवार से करनी चाहिए। अगर आप अपने परिवार के लोगों के ही बारे में कुछ नहीं जानते हो तो फिर परिवार से बाहर कैसे कर सकोगे। कुछ लोग करते भी है की उनका बाहर परिवार के लोगों से हटकर सम्बन्ध अच्छे है पर परिवार के लोगों के सदस्यों से नहीं। इससे अलग एक और काम है जिससे आप अपने व्यवहार में सरलता , सुगमता और कुशलता ला सकते है वो है समय सारणी। जैसे सभी चीजों के लिए कोई न कोई मानक निर्धारित है या माने गये है ठीक उसी प्रकार जिंदगी को अच्छे तरह से जीने के लिए समय की उपयोगिता को समझना बहुत जरुरी है।
कैसा लगा आपको मेरा यह व्लॉग कृपा बताये और इस पर विचार अवश्य करे, क्योंकि मैंने यह अनुभव किया तभी लिखा। धन्यवाद।
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