जिंदगी का फलसफा
जिंदगी शब्द जितना कहने में आसान होती है या लगने में लगती है उतना सरल, आसान नहीं होती , ऐसा केवल अनुभवी लोग ही कह सकते है।जिन्होंने जिंदगी में अपने बहुत उतार चढ़ाव देखे है या ऐसी परिस्थितियों से होकर गुजरे है जहां यह जरूर महसूस हुआ होगा की अब जिंदगी से किनारा कर लिया जाए ,लेकिन फिर भी उत्साह और हार ना मानने वाली प्रवृति के चलते उन कठिन परिस्थितियों से उभरे है और जिंदगी में स्थिरता प्राप्त की है। वहीं अन्य लोग सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए जिंदगी को सरल, सहज और आसान मानते हुए जिंदगी जीते है उनमें कुछ लोग प्रसिद्धि भी प्राप्त करते है और कुछ लोग अपनी निजी जिंदगी में संतोष की भावना को अपनाते हुए जीवन को सफल मानते है।
यह बात तो क्लियर है की प्रकृति या भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को बनाया है और प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी रूप में एकसमान नही है , सभी एक दूसरे से भिन्न भिन्न है फिर चाहे वो रूप, व्यवहार , विचार , बनावट, रंग आदि का आधार हो, सभी एक दूसरे से बिल्कुल अलग होते है ।जब व्यक्तियों में कोई समानता नहीं है तो फिर सिद्धांतो, धारणाओं, मान्यताओं और विचारों में समानता होना थोड़ा मुश्किल है । ये जरूर है की किसी विशिष्ट परिक्षेत्र के व्यक्ति सामूहिक स्तर पर अपने विशिष्ट गुणों को लेकर एक समान हो सकते है वो संस्कृति, परम्पराओं, आदतों , व्यवहारों को लेकर हो सकते है, लेकिन गहराई में जाने पर सभी में भिन्नता नजर आने लगती है।उदाहरण के तौर पर हम समुंद्र में जितनी गहराई में उतरते जाते है उतनी ही विलक्षण चीजों की जानकारी हमे होती जाती है ,ये नियम वर्तमान के वैज्ञानिक युग में जारी है और आगे भी जारी रहेगी है क्योंकि हमे पृथ्वी पर व्याप्त सभी पहलुओं की सीमित जानकारी ही है, बल्कि ऐसे कई पहलू है जिन्हे शायद हमने छुआ भी नहीं है, तो ऐसे यह बिल्कुल भी निर्धारित नही किया जा सकता या माना जा सकता की जिंदगी जीने के लिए कोई मान्यता, नियम , शर्ते या धारणा है जिसके पालन से हम अपने जीवन को सफल बना सकते है ।
अब जिंदगी कैसी है, कैसी होनी चाहिए , जिंदगी के लिए क्या जरूरी है , सफल या कामयाब जिंदगी के तरीके क्या है , ऐसे कई सवाल मन में खड़े होते है जिसका जवाब शायद हम सभी कभी ना कभी अपने जीवन जरूर सोचते होंगे ।दुनिया में कई महान विद्वानों ने इस पर अपने अपने मत दिए है या होंगे।अब कौन सा मत या विचार सबसे अधिक तार्किक और सटीक है इसका अनुमान केवल हम सभी अपने जीवन के अनुभवों के अनुसार घटनाओं, परिस्थितियों आदि के हिसाब से अनुमान लगाते है और अनुसरण करने की कोशिश करते है।लेकिन इसी बीच हमरे जीवन ऐसी परिस्थितियां सामने आती है की जिसे हम बिल्कुल सुलझा नहीं सकते है और उसी में फसकर रह जाते है।फिर चाहे वो किसी भी मत के अनुसार चल रहे हो या अनुसरण कर रहे हो।कहने को कुछ व्यक्तियों की जीवन शैली , विचारधारा , परिस्थिति समान हो सकती है ,लेकिन अगर हम उन व्यक्तियों के जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करे या देखें तो यह साफ हो जाएगा की उन सभी व्यक्तियों की जिंदगी के मायने अलग अलग है, किसी भी व्यक्ति का एकसमान नही है।
एकसामान धारणाओं वाली विचारधारा केवल और केवल उन सभी व्यक्तियों की जिंदगी का केवल वृहद रूप ही है।ऐसे में यह मानना की सफल जिंदगी के लिए कोई रास्ता, कोई धारणा, विचार ,मार्गदर्शक हो सकता है तो ऐसा मेरे विचार में गलत है। हम अपने जीवन में व्यवहार , विवेक, बुद्धि , चिंतनशीलता आदि माध्यमों के जरिए केवल अपने आपको बदल सकते है , रही दूसरों को बदलने की अर्थात अपने अनुसार आवश्यक परिस्थिति बनाए रखने में भी कामयाब हो सकते है लेकिन वो भी अल्पावधि में बिल्कुल भी नही ।यह एक लंबी प्रक्रिया है , हां पर किसी घटना या स्थिति में अल्पावधि में भी परिवर्तन संभव है या होता है।लेकिन फिर भी अपनी पूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ रहते है।पूर्ण आवश्यकताओं या इच्छाओं की पूर्ति के लिए हमे संघर्ष के साथ साथ इंतजार करना पड़ता है और उचित समय में इनके पूरा न होने पर हमारी जिंदगी या जीवन के मामले निरंतर बदलते रहते है। शायद इन्ही सब कारणों से हमारे जीवन में दो ही अटल सत्य है जन्म और मृत्यु।जन्म के पश्चात सूर्य , वायु, पानी, पृथ्वी आदि सभी सत्य प्रतीत होते है और इन सभी तत्वों या पहलुओं का ज्ञान या विश्वास हमे कभी होता है जब जन्म और मृत्यु के बीच अंतर हो , मतलब जीवन हो।जीवन वही है जो जन्म के पश्चात हम जीवन के सभी शैलियों को जीते हुए अपने बौद्धिक ज्ञान के स्तर के पश्चात मृत्यु को प्राप्त होते है।अब यदि कोई बच्चा जन्म के कुछ समय पश्चात ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो उसे क्या पता होगा जिंदगी क्या होती है।
मानवीय समाज के द्वारा ही हमने आदर्श जीवन की भावना को ग्रहण किया है और आदर्श जीवन की कल्पना की प्राप्ति के लिए हम उन्हीं आदर्श रूपी व्यवहारों, क्रियाओं, विचारों, धारणाओं आदि का पालन करने के पक्ष में रहते है।
जिंदगी में व्यक्ति अपने अलग अलग परिस्थितियों में अपने वास्तविक छवि के अनुरूप आचरण करता है, ऐसे में अगर वह इस स्थिति में अनुभवी लोगों की सलाह लेता है तो वह उस परिस्थिति को कुछ बेहतर अवश्य बना सकता है ।अब व्यक्ति अपने आस पास ऐसे अनुभवी लोगों को कैसे तलाशे जो ऐसी परिस्थिति या उसके समकक्ष स्थिति से गुजरे हो ,इसके लिए व्यक्ति का सामाजिक होना आवश्यक हो जाता है । व्यक्ति ऐसे में विद्वानों के लेख , विचार आदि भी प्रयोग कर सकता है जोकि मानवीय गुणों के आधार पर लिखी गई हो ,वो धार्मिक ग्रंथ, वेद, उपदेश, ऐतिहासिक लेख, प्रेणादायक लेख, विद्वानों के विचार आदि किसी के रूप में हो सकते है।लेकिन व्यक्ति अधिकतर विषम परिस्थितियों में विचलित हो जाता है और उसका ध्यान केंद्रित न होकर विचरण की दिशा में रहता है, स्थिरता की ओर उसका ध्यान बिल्कुल नही जाता ।क्योंकि स्थिरता प्राप्ति की प्रक्रिया भी अपने आप नही होती वो भी अनुभव का ही एक अंश है।जैसे जैसे व्यक्ति अपने जीवन में आगे बढ़ता चला जाता है और ऐसे कई परिस्थितियों से होकर गुजरता है तो अपने जीवन के उस क्षण पर भी पहुंच जाता है की वो विषम परिस्थितियों को भी सहजता से स्वीकार कर निराकरण भी कर लेता है लेकिन ऐसा वही व्यक्ति ही कर पता है जो अपने अनुभवों से सीखता है ।जिंदगी व्यक्ति को हर पल कुछ ना कुछ नया रूप दिखाती ही है और जो व्यक्ति अपने जीवन से कुछ नही सीख पाता वो अन्य माध्यमों से शायद उतना अधिक सीख पाने में असमर्थ रहता है।जिंदगी में तुलनात्मक दृष्टिकोण का भी अपना अलग महत्व होता है ,अगर व्यक्ति उसका प्रयोग सही दिशा में करे तो। क्योंकि तुलनात्मक दृष्टिकोण संतोष के भाव का अवरोधक है।जाहिर सी बात है की अगर व्यक्ति पूर्व निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सही दिशा में मेहनत करता है तो लक्ष्य अवश्य मिलता है ,अगर लक्ष्य नही मिलता तो पूर्व निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति की अवधारणा का चयन से लेकर आपके प्रयास पर भी सवाल उठना लाजिमी है।वैसे व्यक्ति के लिए अपने जीवन में अनिश्चित आयामों की भरमार होती है , किसी भी आयाम में सफल असफल दो ही पहलू हो सकते है लेकिन ऐसे में संतोष व्यक्ति की स्थिरता में अवश्य मदद कर सकता है।
मेरे विचार में जिंदगी को किसी के अनुरूप न जीकर अपने अनुरूप जीना चाहिए ,जैसे जैसे जिंदगी आगे बढ़ती चली जाती है हम नित नए अनुभवों को सीखते हुए , करते हुए आगे बढ़ते चले जाए ।साथ ही प्रयोग भी करते जाए क्योंकि नए प्रयोग जिंदगी में रोचकता , संघर्षशील, अनुभव और जिंदगी के प्रति प्रेम जैसे भाव को जागृत करता है , जिससे हमे जिंदगी में सरल भाषा में कहे तो मजा आने लगेगा । नए प्रयोग सकारात्मक और नकारात्मक भी होंगे लेकिन व्यक्ति को स्थिर होना आवश्यक नही क्योंकि प्रकृति का यह भी नियम है की कोई भी चीज मानवीय जीवन में स्थिर नहीं रहती ,उसमे बदलाव होना स्वाभाविक ही है , बस बदलना केवल मानवीय गुणों के प्रति नही होना चाहिए।सामाजिक गुण , नियम तो समाज की परिस्थिति, पर्यावरण , भौगोलिक स्थिति आदि के आधार पर आधारित होते है लेकिन मानवीय गुण सभी परिस्थितियों में एकसामान होते है।
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