आजादी -भारतीय मायने

अभी हाल ही में हम सभी ने बड़े गर्म जोशी के साथ भारत के आज़ादी की 76 वीं वर्षगांठ बनायीं है। देश के प्रधानमंत्री जी के आह्वाहन से ऐसा माहौल बन गया की सभी देशवासियों ने इसे एक  बड़े त्यौहार की तरह बनाया।देश के सभी कोने में झंडा रोहन कर जश्न मनाया गया। खैर अपनी उम्र में अभी तक के आज़ादी महोत्सव में से इस साल का आज़ादी  महोत्सव सबसे यादगार और गर्वान्वित करने वाला लम्हा बना है सभी के लिए क्योंकि इससे पहले इतने व्यापक स्तर पर शायद जब देश आज़ाद हुआ होगा तब ऐसा जश्न मनाया गया होगा , ऐसा शायद सभी लोग भी मानते होंगे। आज़ादी को याद करना हमारी जिम्मेदारी भी है और मानवीय प्रकृति भी है।  
 आज़ादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद आज की युवा पीढ़ी आज़ादी के बारे में क्या सोचती , क्या मायने है और किनी गंभीर है , इसका विश्लेषण करते है।  वैसे आज़ादी से जुड़ा हमारा पूरा इतिहास है , जिसे जिया तो नहीं जा सकता पर महसूस किया जा सकता है।  अच्छा महसूस भी वही लोग कर सकते है जिन्होंने अपनी निजी ज़िन्दगी में आज़ादी के मायने समझे है या आज़ादी को जिया है।आगे बढ़ने से पहले हम आज़ादी से क्या समझते है वो जरुरी है। 
आज़ादी को दुनिया के बहुत सारे लेखकों ने ,महापुरषों ने , किताबों में , ग्रंथो में परिभाषित किया ही है और भारतीय संविधान में मानवीय मूल्यों के अनुसार आज़ादी को ग्रहण भी किया है। लेकिन उसके बावजूद भी लोगों को अक्सर यह कहते सुना ही होगा हम आज़ाद नहीं है , विदेशों में व्यक्ति को अधिक स्वंतंत्रता मिलती है , भारत में नहीं। जो लोग ऐसा कहते है या मानते है उनके अनुसार उनके दैनिक गतिविधियों के अंतर्गत जो भी कार्य है उसमे पूर्ण स्वतंत्रता , कोई रोक टोक नहीं, कोई कानून नहीं , कोई बंधन नहीं , कोई सीमा नहीं आदि। पर क्या यह संभव है हमारे भारत जैसे देश में , जोकि अनेकता में एकता का परिचायक है।मेरे विचार में आज़ादी को मानवीय समाज में अधिकार के नाम से जाना जाता है।

 भारतीय संविधान में उन सभी आवश्यक पहलुओं को शामिल किया गया है जिससे प्रत्येक भारतियों को आज़ादी का आभास हो और आज़ादी के साथ जीवन यापन कर सके , सम्मिलित और संगठित  समाज के लिए।सबसे पहले हमें ये समझना होगा कि  दुनिया में संतुलन और प्रगतिशील समाज के लिए एक निश्चित सीमा या साधारण शब्दों में कहे नियंत्रण बहुत ही आवश्यक है। ये नियंत्रण हम अक्सर कानूनों के रूप में देखते है , जोकि स्थायी नहीं है। कानूनों में समयनुसार बदलाव या नए कानून  आते  रहते है ,यही प्रगतिशील समाज की पहचान है। सीधे शब्द में आज़ादी वो है जिसमे आप अन्य लोगों को प्रभावित किये बिना किसी भी स्तर पर ,अपना दैनिक  कार्य या जो भी करना चाहे वो करते है और विकास की और अग्रसित होते है। 
अक्सर लोग अन्य विकसित देशों के समाज के की  तुलना भारतीय समाज से करते है आज़ादी के परिपेक्ष्य में।दुनिया के किसी भी समाज के किसी कार्य, घटना , नियम , कानून , प्रगति की तुलना भारतीय समाज से करने से पहले हमें उस समाज की भौगोलिक स्थिति की भी तुलना कर लेनी चाहिए और अगर सभी मानवीय मूल्यों को उस क्षेत्र की स्थिति , बनावट , भौगोलिक , आर्थिक , राजनितिक , मान्यताओं , संस्कृति की तुलना कर ली है तो आपको निश्चित ही महसूस हो जायेगा की आप विश्व की सबसे सुसज्जित , संगठित , मानवीय संस्कृति का हिस्सा है। 
अब एक और बात आती है जिसकी तरफ हमारा समाज अग्रसित हो रहा है ,  व्यक्तिगत आज़ादी। व्यक्तिगत आज़ादी से मतलब परिवार , कुटुंब , समाज ,परम्परा , संस्कृति से आज़ादी। जोकि नकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करता है।
आखिरी में मेरे विचार से दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र का हिस्सा है और लोकतंत्र ही केवल एक मात्र मध्यम है स्वतंत्रता ,आजादी का जो हमे मिला हुआ है। हम लोग , हम सत्ता पर आसीन किसी भी पार्टी को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप में वो भी हमारे द्वारा ही संचालित होती है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी , सबसे अधिक धार्मिक विविधता, सबसे अधिक वैचारिक विविधता , सबसे अधिक सामाजिक , आर्थिक विविधता ,संस्कृतियों में विविधता , क्षेत्रीय विविधता , भाषीय विविधताओं आदि के होते हुए भी समाज के प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्त है । हां एक तथ्य है कि अगर किसी कारणों से किसी व्यक्ति के आजादी का हनन होता है ,तो उसका उचित न्याय भी होता है ।इसमें यह बिल्कुल स्वीकारने में कोई भेद नहीं है की न्याय की प्रक्रिया में विलम्ब होता है , जिसमे सुधार निरंतर जारी है।इसका यह भी पक्ष है की न्याय के लिए व्यक्ति से जुड़े सभी पक्षों पर ध्यान देना पड़ता है , क्योंकि समय दर समय मुख्य बिंदु में परिवर्तन हो ही जाता है।इसके उदाहरण के लिए किसी अन्य राज्य में किसी व्यक्ति ने व्यक्तिगत तौर पर अन्य धर्म या संस्कृति को स्वीकार न करने पर टिपण्णी की , अब यह मामला धीरे धीरे व्यक्ति के परिवार, कुटुंब, समुदाय, समाज, धर्म में परिवर्तित कब हो जाती है इसका अनुमान लगाया नही जा सकता है।खैर आजादी तो हमारे समाज में इतनी है की हम कानून तोड़ते हुए रोड क्रॉस करते है , तेज रफ्तार में चलते है , प्रतिष्ठित , सम्मानित व्यक्ति पर अभद्र टिपण्णी करते है ,धार्मिक छींटाकशी करते है, हेरा फेरी करते है आदि ऐसे बहुत से कार्य करते है जिसमे पकड़े गए तो कानूनन सजा और बच गए तो आजादी का फायदा।धन्यवाद।

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