उलझन

सुलझा सा हूं मैं जीवन में ऐसा लोग कहते है
                               चिंता ये है की अपने नही बस गैर कहते है
गैर की क्या चिंता करे फिक्र अपनों की है
                             शायद अपनो के सिवा गैरों में उलझा  हूं मैं
पता नही क्या उलझन है जो सुलझी नही है
                            सुलझाने पर भी और उलझी हुई लगती है
 सारी कमी क्या मुझमें ही है शायद शामिल
                            शायद मैं खुद नही हूं अपनो के ही काबिल
अब जाऊं तो जाऊं कहां डगर दिखती नही
                          उलझन यही है की उलझे है रिश्ते या खुद मैं
अधूरे रिश्तों पर चलना माना मेरी कवायत नही
                           मंजिल तक पहुंचा जाए तो जाए किस तरह
अकेले इन रास्तों पर चला जाए तो किस तरह
                           दुनिया में हमने भी बस सीखा ये भी सबक है 
खुद को बदल डालूं क्या बस औरों के लिए ही 
                            ख्याल आते ही उलझन में ही पड़ जाता हूं
क्या इसमें मैं खो गया दुनिया के बाजार में
                           खुद के साथ साथ अपनो से दूर हूं अब मैं
पता नही अब भी जमाने में कामयाब हूं मैं
                        खोकर अपनों के रिश्ते क्या धनवान हूं मैं अब
लगते है अब अपने रिश्ते बस मतलबी मुझको
                         रुकती उम्र तो उस पड़ाव पर बस थम जाता
थे सभी रिश्ते बिना मतलब के बस अपनो में
                         थे जिस पल सब अपनो के बगैर न रहा जाता
गुजर जाने पर वक्त फिर कहां वापस आता है
                          सबकुछ बस उसी पल में ही सिमट जाता है
अब हर कोई सुनने को मनमाफिक चाहता है
                         गैर तो गैर है अपनो में अकेला ही रह जाता हू
ना चाहते  मैं बस इसी उलझन में जिए जाता हूं
                        इसीलिए पीछे तो थोड़े आगे नहीं बढ़ पाता हूं
मनन चिंतन हर बात बस मन में ही करता हूं
                       भावों के शब्दों को केवल पन्नों में लिख पाता हूं
उलझन में ही भावों को मुख में नही ला पाता हूं
                      सारी कोशिश इसी कदर उलझन में ही दबाता हूं
इसीलिए आजकल का समय उलझन में बिताता हूं
                   अपनो के रिश्तों को निभाने में खुद अधूरा पाता हूं।










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