शिक्षित व्यक्ति

शायद हम सभी बड़े आसानी से शिक्षित और अशिक्षित व्यक्तियों में तुलना कर सकते हैं और अपने जीवन में शिक्षित स्तर को पहचानते ही होंगे।लेकिन कभी कभी जीवन के ऐसे कई पड़ाव ,स्थिति में हम शिक्षित व्यक्ति की पहचान उसके सामाजिक, व्यवहारिक गुणों के आधार पर भी करते है और उसी को सर्वोच्च भी मानते है।शायद मैं गलत न हूं तो हमारे समाज में शिक्षित व्यक्ति की पहचान का आधार उसकी प्राप्त डिग्रियों से कार्य है, लेकिन उसके अलावा एक अलग पहलू भी है जिसके आधार पर हम व्यक्ति को शिक्षित मानते है जैसे उसकी बुद्धिमता क्षमता, शैक्षिता स्तर , समकालीन परिस्थिति का ज्ञान , उचित अनुचित का ज्ञान, परिस्थिति के अनुसार व्यवहार, निस्वार्थ व्यवहारिक गुण आदि गुणों के आधार पर व्यक्ति को शिक्षित वर्ग की श्रेणी में आसानी से स्वीकार करते है और मानते है की ऐसा व्यक्ति डिग्री प्राप्त व्यक्ति की तुलना में अधिक स्वीकारीय है समाज के लिए।

बड़ी बड़ी डिग्री लेने  या अध्ययन , पढ़न पाढ़न करने वाला व्यक्ति केवल इस आधार पर शिक्षित व्यक्ति माना जायेगा प्रमाण आवश्यक होता है, हालांकि प्रमाण के लिए सत्यापन की जरूरत होती है, इसलिए डिग्रियां काम आती है जो जानता है वो आपसे उसी स्तर के व्यवहार ,क्रियाएं  करने का प्रयास करता है।साधारण भाषा में कहे तो डिग्रियां आपके बौद्धिक स्तर के ज्ञान को प्रदर्शित करने का एक माध्यम मात्र है जिसे वर्तमान में उपयोगितावाद के अवसर के लिए आवश्यक माना गया है।लेकिन जीवन को जीने में या जीवन के सफर में ऐसे कई पड़ाव आते है कहां हम ये स्वीकार करते है की जो व्यक्ति आसानी से सहजता दृष्टिकोण को अपनाता है ,सहज व्यवहार करता है उसी को वास्तविक शिक्षित व्यक्ति की संज्ञा देते है।ऐसा व्यक्तित्व हमेशा प्रयत्नशील रहता है की भविष्य की परिस्थितियां उसके अनुरूप रहे ।एक साधारण व्यक्ति चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थिति में जीवन यापन कर रहा हो, लेकिन फिर भी उसके पास ऐसे कई रास्ते होते है जिनके द्वारा, बिना किसी के सहारे से ,  वह विपरीत परिस्थिति को अपने अनुकूल बना सकता है ।इसके लिए वह अपने कुछ भावों का त्याग कर और संयम, धीरज,संतोष , सहजता आदि भावों को ग्रहण कर जीवन सफल, सुखदमय बना सकता है। उस पल हमको यह इतना सरल या सहज नहीं लगता क्योंकि हम अक्सर इस पर ध्यान नहीं देते ।जैसे एक रोड पर हम जा रहे है और उस पर डिवाइडर पड़ते है तो हम स्पीड को कंट्रोल कर  आराम से रोड क्रॉस करते है ,ठीक उसी प्रकार हम जीवन को तीव्र गति से ओ भी एक समान भाव से , गति से नही जी सकते ,अगर जीते भी है तो नीरस का स्वाद अवश्य आपने जरूर चखा होगा।ऐसे में कुछ सवाल है जिन्हे दार्शनिक कहां जा सकता है लेकिन यथार्थ की कसौटी पर खरे उतरने उतरने वाले सवाल है जिसका उत्तर केवल और केवल आप ही सुनिश्चित कर सकते है ,कोई दूसरा व्यक्ति नही जैसे मैं कौन हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य है, क्या प्राप्त करना चाहता हूं मैं, क्या करना चाहिए और क्यों करना चाहिए ? आदि ऐसे कई सवाल है जिसका जवाब केवल हम ही खोज सकते है या निर्धारित कर सकते है अपने जीवन के सफर के अनुसार। ऐसा केवल वही व्यक्ति कर सकते है जो अपने जीवन को असंतोष भाव से जी रहे है या अक्सर कहते है बड़ा कठिन समय चल रहा है, सब गलत समझ रहे है मुझे, मैं विपरीत परिस्थिति में जी रहा हूं आदि। ये ऐसे सवाल है जिनका निर्धारण कोई और नहीं केवल आप ही कर सकते है।
आप अपने बीते हुए समय को सुधार  या उसमे हस्तक्षेप बिल्कुल नही कर सकते है लेकिन आप अपने वर्तमान को सही से समझ कर वर्तमान के साथ साथ भविष्य को सुखद और सरल, सहज बना सकते है।साधारण शब्दो में कहे तो ऐसे कई रास्ते होते है हमारे पास ऐसी परिस्थिति में जब हम अपने आपको अकेला, सभी को दोषी मानने लगते है, लेकिन ऐसे कई तरीके होते है जिन्हे अपनाकर हम अपनी परिस्थिति में बदलाव आसानी से ला सकते है ।जिनपर हमारा ध्यान बिल्कुल नही जाता क्योंकि हम अक्सर उस चिंता, विचार ,परिस्थिति, में इतने डूबे हुए होते है की कोई सलाह भी हम अपनी कमी मानकर देखते है और स्वीकार नहीं करते है।ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि व्यक्ति को उत्तम चीजे अपनी निजी अनुभवों से ही प्राप्त होती है और ये सभी चीजे आपके मानसिक , व्यवहारिक, सामाजिक ,भौतिक गुणों का विकास करती है।अगर हम शांत होकर अन्य प्रभावपूर्ण व्यक्तियों की तुलना, अध्ययन करेंगे तो वो स्वयं किसी न किसी मानसिकता , विचार से प्रेरित व्यवहारिक दृष्टिकोण होगा । जिसका अपना स्वयं का विचार प्रभावित होगा उसका स्थिर होना स्वाभाविक नही है ,उसमे परिवर्तन करना सरल है, बस आवश्यकता है अपने विचार को उनके समक्ष सही तरीके से रखने की या सहजता के साथ उसके विचारधारा को अपनाने की और बिना बताए , बिना एहसास के उसके विचारधारा को बदलने, नया रूप देने का प्रयास करने की है।
जीवन के ऐसे पड़ाव आते है जब आपको ऐसा लगने लगता है की दूसरे व्यक्ति मेरी छवि खराब कर दिया है, मेरी स्थिति अन्य लोगों ने खराब की है , मैं उनकी वजह से परेशान हूं ,आदि ऐसे कई तरह की स्थितियां सामने आती है और हम निराश, हताश , नीरस जैसे भावों से भरे हुए होते है । उस पल हमको जीवन व्यर्थ सा लगने लगता है लेकिन वहीं हम एक सरल सा तथ्य भूल जाते है की इन सबके पीछे कारण क्या है? , और अन्य लोग क्यों आपका व्यक्तित्व निर्धारण करे ,जबकि वो तो आपको करना है। व्यक्ति की एक मानसिकता होती है अगर आप किसी के आंतरिक, बह्यीय या सलग्न जीवन में हस्तक्षेप करेंगे तो वह व्यक्ति मौका मिलते ही आपके जीवन में हस्तक्षेप करेगा ही, फिर चाहे वो प्रत्यक्ष रूप में या अप्रत्यक्ष रूप में क्योंकि जाने अंजाने में आपने अन्य लोगों के जीवन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में प्रभावित किया है।ऐसे में अगर आप निश्चित है ऐसा कोई स्थिति नही है आपके सामने तो बैबाकी आप अपनी रह चुने ,जिसमे आपको अपने व्यक्तित्व के अनुसार वातावरण मिल सके, पर इतना अवश्य परख लें की जो आपने सोचा है उसका वर्तमान, भविष्य स्तर क्या होगा।फिर बिल्कुल परवाह न करे दुनिया क्या कहेगी, लोग क्या कहेंगे ?, अगर आप इस डर से जीवन के फैसले नही ले पा रहे है की चार लोग क्या कहेंगे तो आपसे बड़ा मूर्ख कोई और नहीं है।ये चार लोग जब भी थे जब समाज का निर्माण हुआ और आज भी है और आगे भी रहेंगे जब तक मानव समाज है।
ऐसे में एक और सवाल आता है की इनका क्या होगा, मतलब जिन्हे आप समझते हो की केवल आप ही इनका सहारा हो , ये सब केवल भ्रम मात्र है।किसी का जीवन किसी के बिना या कोई भी कार्य किसी के बगैर नहीं रुकता ,फिर चाहे उसमे थोड़ा समय , उत्तमता की कसौटी पर खरे न उतरते हो ,पर फिर भी निरंतर चलता रहता है ।हमेशा व्यक्ति निर्भर व्यक्ति के जाने पर काबिल व्यक्ति की तलाश कर ही लेता है ।आपके भविष्य की घटनाएं या परिस्थिति आपके वर्तमान में की गई प्रतिक्रियाओं के अनुसार होती है फिर चाहे वो क्रिया के रूप में हो , व्यवहार के रूप में हो ,विचार के रूप में हो या किसी भी माध्यम के रूप में हो।
खैर इतना सारा विचार विमर्श करने के पश्चात कोई व्यक्ति अपनी सहजनता वाली प्रतिक्रियां करता है ,और अगर नही करता  तो उसके सामने कभी भी विपरीत परिस्थितियां नही आएंगी, यह निश्चित है और अगर आती है तो मात्र कुछ समय के लिए ही।फिर ऐसे किस प्रकार अपने आपको संयमित कर, या साधारण भाषा में कहे तो जीवन जीने के लायक सुखदपूर्ण एहसासों के अनुभवों के काबिल बनाया जाए , इसका उत्तर केवल और केवल व्यक्ति स्वयं कर सकता है।
मेरी अपनी निजी जीवन की परिस्थिति ऐसी है की मैं किसी से सांझा नही करता अपने विचार , अपनी परिस्थिति वहीं मेरी पत्नी है जो अपने नकारात्मक विचारों को सांझा करती है अन्य लोगों के साथ जिन्हे वो अपने विश्वास पात्र समझती है।जिनके बारे में यानि मेरे पारिवारिक सदस्यों के बारे में वो अपना विचार रखती है ,ऐसा उसका अनुभव , विचार है ,पूर्वानुमान है और उसी के आधार पर मेरे पारिवारिक सदस्य उसके प्रति अपना विचार , व्यवहार, भाव रखते है जोकि  नकारात्मक  दृष्टिकोण है।मैने अभी तक इसका विरोध नही किया है क्योंकि मेरे लिए दोनो एक दूसरे के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखते है ,तो जायज है नतीजा अति नकारात्मक ही होगा, यहां गणित का फार्मूला काम नहीं करता की माइनस माइनस प्लस हो जायेगा ।जीवन के सफर में माइनस माइनस अति माइनस हो जाता है।अच्छा अभी भी मेरे निजी तौर पर मेरे पारिवारिक सदस्यों का व्यवहार मेरे समतुल्य ही है, मैं जैसा करता हूं वैसा मुझे प्राप्त होता ही है, पर उसमे भी धीरे धीरे परिवर्तन होगा ,जिसका मुझे पता है या आभास है।क्योंकि शादी के बाद आपके  द्वारा या आपके पत्नी द्वारा दिया गया विचार ,वक्तव्य,कथन , दोनों पर लागू होता है और अन्य लोग आपको उसी नजरिए से देखेंगे ,जिसे आप रोक नहीं सकते। अब पत्नी द्वारा कहे गए कथन मुझपर भी लागू होने लगेंगे और मेरे पारिवारिक सदस्य मुझसे दूर होने लगेंगे। इसमें एक बात मुख्य है की किसी चरण में पहल सदस्य करेंगे और किसी में मैं स्वयं , पर मैं जब भी ऐसा कोई कदम उठाऊंगा मैं अपने ही नजर में गिरा हूं महसूस करूंगा।ऐसा इसलिए नही की मैं इसे रोक न सका बल्कि मैं इस परिस्थिति को जानते हुए भी अलग तरीके से निर्वाह कर सकता था।
खैर ये बाद की बात है, अभी जिस स्थिति में हूं उसे पहले निपट लूं फिर और तजुर्बे आप सबके बीच साझा करूंगा।

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