इंसान के जीवन का सफर
इंसान के जिंदगी के सफर को शब्दो में बयां करना इतना सरल नही जितना कहने और पढ़ने में सरल लगता है।जमीन पर जितने भी प्रकार के इंसान है ठीक उतने ही उनके जीवन का सफर है और वो भी अलग अलग।
हालांकि कुछ अंशों या स्तर पर समांतर माना जा सकता है लेकिन असलियत में नजदीक से अध्ययन करने पर पता चलता हैं की वाकई में सभी इंसानों की परिस्थिति बिल्कुल समान नही है।चाहे उसमे रंग, धर्म , ज्ञान , भाव , बुद्धि आदि किसी भी प्रकार के स्तर में भिन्नता स्पष्ट दिखाई दे सकती है । अच्छा सवाल का उत्तर की संतुष्टि दोनो पक्ष के सोच, विचार , बुद्धि पर आधारित होती है ,चाहे वो समांतर होती हैं असमताएं लेकिन वही तीसरे व्यक्ति के सामने भी वही परिस्थिति काम करती है।इंसान के जीवन के सफर को यथार्थ और अध्यात्म भाव से परिभाषित करने का प्रयास मेरा भी है जो मैने अपने मानवीय समाज में रहकर सीखा है।
देखता है सबकुछ पर देखता कुछ नही
सुनता है सबकुछ पर सुनता कुछ नही
खाता है सबकुछ पर खाता कुछ नही
बोलता है सबकुछ पर बोलता कुछ नही
लिखता है सबकुछ पर लिखता कुछ नही
मानता है सबकुछ पर मानता कुछ नही
हंसता है सबकुछ पर हंसता कुछ नही
चाहता है सबकुछ पर चाहता कुछ नही
जानता है सबकुछ पर जनता कुछ नही
करता है सबकुछ पर करता कुछ नही
समझता है सबकुछ पर समझता कुछ नही
सोचता है सबकुछ पर सोचता कुछ नही
खोजता हैं सबकुछ पर खोजता कुछ नही
खोता है सबकुछ पर खाता कुछ नही
आता है सबकुछ पर आता कुछ नही
पाता है सबकुछ पर पाता कुछ नही
होता है सबकुछ पर होता कुछ नही
बस इन्ही रास्तों से गुजरता है हर इंसान
रोते , हंसते, रोते जीता है अपना किरदार
सबकुछ पाकर भी अधूरा रहता है इंसान
बस कहने के लिए दुनिया है बड़ी आसान
एक पल के इंतजार में ही गुजरते है कई साल
होती नही पढ़ाई जिंदगी की किसी स्कूल में
हर उम्र नया सबक होता है इंसान के लिए
होती ना शिक्षा तो होते ना ये अकेले इंसान
ज्ञान के आगे शारीरिक बल का न होता आधार
विज्ञान को दिया हम इंसानों ने ही नया आयाम
इसलिए तर्कों पर लटका दी हमने रिश्तों की डोर
बदलती जा रही है इंसान के जीवन का सफर।
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