असमंजस




गुज़र रहा हूं आजकल मैं उस राह से
जहां से शायद अक्सर कई गुजरे हैं
सबके साथ या फिर नई शुरुवात चुनूं
जानता हूं मैं दोनो को मिलाने का हुनर
पर क्या करूं दोनों हैं दूसरी दिशाओं से
बीच में खड़ा हूं मैं तीसरी दिशा की ओर
पल पल घूमता रहता हूं अक्सर उधर इधर
आती हैं जब ठंडी हवाएं दोनो दिशाओं से
लगता है कमी मुझ में ही है सारी अब
खड़ा जो हूं मैं बीच राह में दीवार बन
दोनों ओर की गर्म हवाएं मुझसे टकराती है
टकराव दोनों का ही काफी तड़पाती है मुझको
क्या खुद को मिटाकर दोनों को लड़ जाने दूं
मृत्यु से डर नहीं मुझे डरता हूं वजूद न मर जाए
इसलिए जीता हूं आधी जिंदगी अब नियतिवाद से
खैर अहम मात्र का वहम है दोनो को बस
कल आज कल क्रियाओं पर होती है चर्चा
विषय यही अक्सर होता है हर घर घर में
चुनाव करना ही तो है सबसे बड़ी परीक्षा
दो ओर के टकराव में खोया मैं इस बाजार में
अनगिनत किस्से कहानियां है इस जहान में
सुने सुनाए कहां तक अब सबको हम जुबानी
इसलिए टकराव को लिखता हूं किताब में

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