अपना - अपना जहां

 






एक दिन पूछ ही लिया भरी महफिल ने मुझसे

जरा बताओ आगे तुम्हारी क्या इच्छा है?

मैने बोला मैं भी इस जहां हिस्सा हूं,

कुछ अलग नहीं तुम्हारा ही किस्सा हूं।

एक दिन मैं भी अपना बाग बनाऊंगा 

किस्म किस्म के फल फूल लगाऊंगा

कोलाहल केवल मधुरता और शांति की होगी

सुगंध कोमलता सी और प्रकृति की छांव होगी

मैं खुद उस बाग का माली बन जाऊंगा

अभी तो मैं व्यस्त हूं जीवन के धागे सुलझाने में

स्वतंत्र होकर इनसे बाकी समय बाग में बिताऊंगा।

महफिल से आवाज आई इतना तो यहां भी मिल जाएगा

नजरिया बदलो नजारे ही नजारे नजर आएगा।

मैं बोला बाग में मेरे यहां के दस्तूर न चल पाएंगे

मानवता के निचले स्तर को न सह पाएंगे

आजादी अर्थ वाकई में समझ आ जाएगा

क्योंकि वहां सभी जिंदगी से थक हार के आएगा

ज्ञान होगा उन्हें फ़लसफ़ा जन्म और मरण का

झूठे ही दिन में चांद तोड़ के कोई न ला पाएगा 

सियासत होगी बस वादियों के ही बीच में

फिर हर कोई हवा में तीर न चला पाएगा।

सौम्यता सिर्फ प्रकृति का न रह जाएगा

उम्र के अंतिम छोर तक वो साथ में जाएगा।

वहां न चलेगा इस दुनिया का कोई दस्तूर

सुकून, संतोष , ठहाकों का अंबार होगा

सभी अपने बचे जीवन के नित नए गुल खिलाएंगे

महफिल पुर जोर से चिल्लाई कमबख्त ,ये क्या बोला,

इच्छा पूछी थी हमने , सपना बता रहा है तू

धागे सुलझाते बीतेगी यहीं , इच्छा से या सपने में कहीं।

उस बाग को अभी तुरंत तू इस दुनिया में ही पा जाएगा 

बैठ हमारे साथ चख ले जरा ये अमृत जो हमें घुमाता है

हर रोज पता नहीं कितने बेहतरीन दुनिया ये दिखाता है 

रही होगी जो भी कमी तेरी दुनिया में ये झट से पूरी कर जाएगा

हो जा तू इसका सबकुछ भूलकर ,भगवान से भी मिल पाएगा।

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