संदेश

अपना - अपना जहां

  एक दिन पूछ ही लिया भरी महफिल ने मुझसे जरा बताओ आगे तुम्हारी क्या इच्छा है? मैने बोला मैं भी इस जहां हिस्सा हूं, कुछ अलग नहीं तुम्हारा ही किस्सा हूं। एक दिन मैं भी अपना बाग बनाऊंगा  किस्म किस्म के फल फूल लगाऊंगा कोलाहल केवल मधुरता और शांति की होगी सुगंध कोमलता सी और प्रकृति की छांव होगी मैं खुद उस बाग का माली बन जाऊंगा अभी तो मैं व्यस्त हूं जीवन के धागे सुलझाने में स्वतंत्र होकर इनसे बाकी समय बाग में बिताऊंगा। महफिल से आवाज आई इतना तो यहां भी मिल जाएगा नजरिया बदलो नजारे ही नजारे नजर आएगा। मैं बोला बाग में मेरे यहां के दस्तूर न चल पाएंगे मानवता के निचले स्तर को न सह पाएंगे आजादी अर्थ वाकई में समझ आ जाएगा क्योंकि वहां सभी जिंदगी से थक हार के आएगा ज्ञान होगा उन्हें फ़लसफ़ा जन्म और मरण का झूठे ही दिन में चांद तोड़ के कोई न ला पाएगा  सियासत होगी बस वादियों के ही बीच में फिर हर कोई हवा में तीर न चला पाएगा। सौम्यता सिर्फ प्रकृति का न रह जाएगा उम्र के अंतिम छोर तक वो साथ में जाएगा। वहां न चलेगा इस दुनिया का कोई दस्तूर सुकून, संतोष , ठहाकों का अंबार होगा सभी अपने बचे जीवन के नि...

अनुभव-गणेश चतुर्थी

चित्र
गणेश चतुर्थी से हमारा ध्यान अधिकतर गुजरात, महाराष्ट्र , खासकर मुंबई की ओर चला ही जाता है।खैर आज के समय में लगभग सभी राज्यों, क्षेत्रों में गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाए जा रहे है।सिंपल में कहे तो सीमित एरिया से निकलकर गणेश जी का एरिया काफी बड़ा हो गया है।साधारणतः भारत के सभी राज्यों के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पूजा विधि में गणेश पूजा सबसे पहले की ही जाति है।गणेश चतुर्थी के समय मुझे एक घटना अवश्य याद आती है। मैं ग्रामीण इलाके से संबंध रखता हूं तो जाहिर ही है की वहां मेरे दोस्त, रिश्ते, जानने पहचानने वाले अवश्य है।हमारे गांव में लगभग सभी स्तर के , सभी समुदाय के लोग रहते है, उसमे मुस्लिम भी है।मेरी गांव में गांव वालों से सबसे प्यार ,सम्मान ,संवेदनशील रिश्ते कायम है। सभी समुदाय के लोग एक दूसरे के कार्यक्रमों में शामिल होते है और सहयोग भी करते है।एक दिन हमारे यहां गौरी गणेश की पूजा थी, हमारे रफीक चच्चा भी आए आरती के समय।  मैं उनके बगल ही जाकर खड़ा हुआ और आरती गुनगुनाने की एक्टिंग करने लगा, जबकि वही चच्चा बुलंद आवाज में गणेश जी की आरती गा रहे थे।आरती के बाद प्रसाद देते हु...

बातों बातों में

चित्र
हम पे जो गुजरी है कुछ नया नहीं है ये सब             यारों हम सबकी कहानी एक जैसी ही है तो गर हो अधिक मायूस ,खफा जिंदगी से तुम             कभी तन्हाई में खुद से बात करके देखा जाय ना जाने कितनों से आगे और पीछे दिखेंगे हम             फिर फिक्र की आग में आज को क्यों जलाया जाए छोड़ो सबकुछ इस पल को दिल से निभाया जाय             दुनिया को समझाने से पहलेखुद को समझा जाए सूरज केंद्र में ही आता है किनारा हमको ही भाता है             अपने आपको दरकिनार ही क्यों किया जाए फिर  इंसान है हम फिर इंसान ही रहने दिया जाए हमे              रखते है आसमान छूने की हसरत हम भी पर अपने परों से औरों को कैसे साथ उड़ाया ही जाए              इसलिए खुला आसमान दूर से अच्छे लगते है                               ...

कश्मकश

चित्र
                                       जिदंगी तेरा क्या कसूर ,तुझको अब मैं क्या कहूं                     बस अफसोस यही है जिंदादिल न तुझे रख सका                     पराए घर से आई है जो उसकी अब बात छोड़ दो                      मैं अपने खून के रिश्तों को भी संभाल न सका                     जिंदगी तेरा क्या कसूर, तुझको अब मैं क्या कहूं।                     वक्त ये आ गया है की तुझसे अब किनारा कर लूं                      पर कैसे इस नन्हे से चेहरे से अब किनारा कर लूं                     बदलेगा ये वक्त भी इसका मैं कैसे भरोसा कर लूं ...

परिवार

चित्र
परिवार शब्द से ही हमे आत्मीयता का बोध होता है।भारतीय दर्शन में इसका महत्व अत्यधिक है। ये अलग बात है की धीरे धीरे परिवर्तित समय के अनुसार इसमें में बदलाव आना स्वाभाविक है।क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण हमारी मनोदृष्टि में बदलाव आया है।लेकिन फिर भी हम कितने ही आधुनिकता के शीर्ष पर खड़े हो,परिवार शब्द हमारे लिए महत्व रखता है।क्योंकि हमारे संबंधी में स्थिरता होती है ,अन्य संस्कृतियों की तुलना में।परिवार के अंतर्गत हम अधिकतर उन रिश्तों या संबंधों के व्यक्तियों को शामिल करते है ,जिनसे हमारा खून का रिश्ता होता है ,जैसे माता,पिता,भाई,बहन,बीवी,पुत्र,पुत्री,दादा,दादी,चाचा, ताऊ ।पर अब परिवार के दायरे में व्यक्ति के अन्य संबधो के लोग भी शामिल होने लगे है।अक्सर हमने यह देख , सुना या अनुभव किया होगा की हम अपने कार्यक्षेत्र , मित्र , अन्य गहन रिश्तों से संबंधित लोगो को भी परिवार के हिस्से के रूप में स्वीकार करते है या कोशिश करते है। जोकि वास्तव में आपके परिवार के सदस्य नही होते है ।व्यक्ति समाज में चल रही सभी क्रियाओं का अनुभव परिवार से सीखता है।परिवार होता तो सबका है ,पर सब...

इंसान के जीवन का सफर

चित्र
             इंसान के जिंदगी के सफर को शब्दो में बयां करना इतना सरल नही जितना कहने और पढ़ने में सरल लगता है।जमीन पर जितने भी प्रकार के इंसान है ठीक उतने ही उनके जीवन का सफर है और  वो भी  अलग अलग। हालांकि कुछ अंशों या स्तर पर समांतर माना जा सकता है लेकिन असलियत में नजदीक से अध्ययन करने पर पता चलता हैं की वाकई में सभी इंसानों की परिस्थिति बिल्कुल समान नही है।चाहे उसमे रंग, धर्म , ज्ञान , भाव , बुद्धि आदि किसी भी प्रकार के स्तर में भिन्नता स्पष्ट दिखाई दे सकती है । अच्छा सवाल का उत्तर  की संतुष्टि दोनो पक्ष के सोच, विचार , बुद्धि पर आधारित होती है ,चाहे वो समांतर होती हैं असमताएं लेकिन वही तीसरे व्यक्ति के सामने भी वही परिस्थिति काम करती है।इंसान के जीवन के सफर को यथार्थ और अध्यात्म भाव से परिभाषित करने का प्रयास मेरा भी है जो मैने अपने मानवीय समाज में रहकर    सीखा है।                               देखता है सबकुछ पर देखता कुछ नही ...

शिक्षित व्यक्ति

चित्र
शायद हम सभी बड़े आसानी से शिक्षित और अशिक्षित व्यक्तियों में तुलना कर सकते हैं और अपने जीवन में शिक्षित स्तर को पहचानते ही होंगे।लेकिन कभी कभी जीवन के ऐसे कई पड़ाव ,स्थिति में हम शिक्षित व्यक्ति की पहचान उसके सामाजिक, व्यवहारिक गुणों के आधार पर भी करते है और उसी को सर्वोच्च भी मानते है।शायद मैं गलत न हूं तो हमारे समाज में शिक्षित व्यक्ति की पहचान का आधार उसकी प्राप्त डिग्रियों से कार्य है, लेकिन उसके अलावा एक अलग पहलू भी है जिसके आधार पर हम व्यक्ति को शिक्षित मानते है जैसे उसकी बुद्धिमता क्षमता, शैक्षिता स्तर , समकालीन परिस्थिति का ज्ञान , उचित अनुचित का ज्ञान, परिस्थिति के अनुसार व्यवहार, निस्वार्थ व्यवहारिक गुण आदि गुणों के आधार पर व्यक्ति को शिक्षित वर्ग की श्रेणी में आसानी से स्वीकार करते है और मानते है की ऐसा व्यक्ति डिग्री प्राप्त व्यक्ति की तुलना में अधिक स्वीकारीय है समाज के लिए। बड़ी बड़ी डिग्री लेने  या अध्ययन , पढ़न पाढ़न करने वाला व्यक्ति केवल इस आधार पर शिक्षित व्यक्ति माना जायेगा प्रमाण आवश्यक होता है, हालांकि प्रमाण के लिए सत्यापन की जरूरत होती है, इसलिए ...

जिम्मेदारियां

चित्र
                                  जिम्मेदारियां         अनकही, छुपी हुई , छोटी बड़ी और पता नही कैसी होती है ये                                                            जिम्मेदारियां       आया संसार जगत में जो कोई अकेला कभी नही छोड़ती है ये                                                         जिम्मेदारियां।    दर्द पीड़ा में भी अब ख़ामोश रखती है ये जिम्मेदारियां                      बेरहम दुनिया में बस जिंदा सी रखती है ये जिम्मेदारियां     कैसे इस मासूम दिल को आदमी बनाती है ये जिम्मेदारिया...

असमंजस

चित्र
गुज़र रहा हूं आजकल मैं उस राह से जहां से शायद अक्सर कई गुजरे हैं सबके साथ या फिर नई शुरुवात चुनूं जानता हूं मैं दोनो को मिलाने का हुनर पर क्या करूं दोनों हैं दूसरी दिशाओं से बीच में खड़ा हूं मैं तीसरी दिशा की ओर पल पल घूमता रहता हूं अक्सर उधर इधर आती हैं जब ठंडी हवाएं दोनो दिशाओं से लगता है कमी मुझ में ही है सारी अब खड़ा जो हूं मैं बीच राह में दीवार बन दोनों ओर की गर्म हवाएं मुझसे टकराती है टकराव दोनों का ही काफी तड़पाती है मुझको क्या खुद को मिटाकर दोनों को लड़ जाने दूं मृत्यु से डर नहीं मुझे डरता हूं वजूद न मर जाए इसलिए जीता हूं आधी जिंदगी अब नियतिवाद से खैर अहम मात्र का वहम है दोनो को बस कल आज कल क्रियाओं पर होती है चर्चा विषय यही अक्सर होता है हर घर घर में चुनाव करना ही तो है सबसे बड़ी परीक्षा दो ओर के टकराव में खोया मैं इस बाजार में अनगिनत किस्से कहानियां है इस जहान में सुने सुनाए कहां तक अब सबको हम जुबानी इसलिए टकराव को लिखता हूं किताब में

व्यवहार- आज का

चित्र
कोरोना को आए दो साल से भी अधिक हो चुके है लेकिन फिर भी अभी लोगों के दिलों में इसका डर एकदम गया नहीं है. इस दौरान आप सभी ध्यान तो दिया ही होगा की हमारे जीवन में क्या क्या बदलाव हुए है या होते जा रहे है.खैर हम जिस मानवीय समाज   का हिस्सा है , जो प्रत्येक परिस्थिति के अनुसार अपने आप को उसके अनुरूप ढाल ही लेता है।  आज के माहौल के हिसाब से बात करे तो आप सभी ने अपने स्वयं या अपने आस पास रहने वाले लोगो के व्यव्हार , प्रतिक्रियाओं के बारे में ध्यान दिया है क्या ? साधारणतः हम सकारात्मक चीजों को ध्यान में रखते है , नकारात्मक चीजे पर कम ध्यान जाता है या जानकर हम इग्नोर करते है, छिपाते है आदि कई तरीकों से नकारात्मक चीजों को ढकने का प्रयास करते है, खासकर ऐसी जगह जहाँ आपकी  इमेज  पर कोई चारित्रिक , व्यावहारिक,आर्थिक  ,सामाजिक प्रभाव पड़ने का डर हो।ऐसा लगभग सभी करते है , मैं भी क्योंकि मैं भी इसी समाज का हिस्सा हूँ।   मेरे विचार या अनुभव के आधार पर ये पूर्ण रूप से कह सकता हूँ की किसी भी कार्य , घटना की आप जितने मर्जी  तैयारी कर ले लेकिन घटना या क...

उलझन

चित्र
सुलझा सा हूं मैं जीवन में ऐसा लोग कहते है                                चिंता ये है की अपने नही बस गैर कहते है गैर की क्या चिंता करे फिक्र अपनों की है                              शायद अपनो के सिवा गैरों में उलझा  हूं मैं पता नही क्या उलझन है जो सुलझी नही है                             सुलझाने पर भी और उलझी हुई लगती है  सारी कमी क्या मुझमें ही है शायद शामिल                             शायद मैं खुद नही हूं अपनो के ही काबिल अब जाऊं तो जाऊं कहां डगर दिखती नही                           उलझन यही है की उलझे है रिश्ते या खुद मैं अधूरे रिश्तों पर चलना माना मेरी कवायत नही              ...

जिंदगी का फलसफा

चित्र
  जिंदगी शब्द जितना कहने में आसान होती है या लगने में लगती है उतना सरल, आसान नहीं होती , ऐसा केवल अनुभवी लोग ही कह सकते है।जिन्होंने जिंदगी में अपने बहुत उतार चढ़ाव देखे है या ऐसी परिस्थितियों से होकर गुजरे है जहां यह जरूर महसूस हुआ होगा की अब जिंदगी से किनारा कर लिया जाए ,लेकिन फिर भी उत्साह और हार ना मानने वाली प्रवृति के चलते उन कठिन परिस्थितियों से उभरे है और जिंदगी में स्थिरता प्राप्त की है। वहीं अन्य लोग सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए जिंदगी को सरल, सहज और आसान मानते हुए जिंदगी जीते है उनमें कुछ लोग प्रसिद्धि भी प्राप्त करते है और कुछ लोग अपनी निजी जिंदगी में संतोष की भावना को अपनाते हुए जीवन को सफल मानते है। यह बात तो क्लियर है की प्रकृति या भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को बनाया है और प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी रूप में एकसमान नही है , सभी एक दूसरे से भिन्न भिन्न है फिर चाहे वो रूप, व्यवहार , विचार , बनावट, रंग आदि का आधार हो, सभी एक दूसरे से बिल्कुल अलग होते है ।जब व्यक्तियों में कोई समानता नहीं है तो फिर सिद्धांतो, धारणाओं, मान्यताओं और विचारों में समानता होना ...

गलतफहमी

चित्र
          सारा खेल उन फालतू गलतफहमियों का है                                         जो सबने दिमाग में ही नही दिल में पाला है            वरना हम भी जिंदगी के खिलाड़ी होते,                                          माता पिता की आंखों के हम तारे होते,          भाईयों के हौसलों के हम भी सहारे होते,                                          भाभियों की दुनिया में  हम ही दुलारे होते           जीवन साथी के एकमात्र हम आसरे होते,                                       ...

आजादी -भारतीय मायने

चित्र
अभी हाल ही में हम सभी ने बड़े गर्म जोशी के साथ भारत के आज़ादी की 76 वीं वर्षगांठ बनायीं है। देश के प्रधानमंत्री जी के आह्वाहन से ऐसा माहौल बन गया की सभी देशवासियों ने इसे एक  बड़े त्यौहार की तरह बनाया।देश के सभी कोने में झंडा रोहन कर जश्न मनाया गया। खैर अपनी उम्र में अभी तक के आज़ादी महोत्सव में से इस साल का आज़ादी  महोत्सव सबसे यादगार और गर्वान्वित करने वाला लम्हा बना है सभी के लिए क्योंकि इससे पहले इतने व्यापक स्तर पर शायद जब देश आज़ाद हुआ होगा तब ऐसा जश्न मनाया गया होगा , ऐसा शायद सभी लोग भी मानते होंगे। आज़ादी को याद करना हमारी जिम्मेदारी भी है और मानवीय प्रकृति भी है।    आज़ादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद आज की युवा पीढ़ी आज़ादी के बारे में क्या सोचती , क्या मायने है और किनी गंभीर है , इसका विश्लेषण करते है।  वैसे आज़ादी से जुड़ा हमारा पूरा इतिहास है , जिसे जिया तो नहीं जा सकता पर महसूस किया जा सकता है।  अच्छा महसूस भी वही लोग कर सकते है जिन्होंने अपनी निजी ज़िन्दगी में आज़ादी के मायने समझे है या आज़ादी को जिया है।आगे बढ़ने से पहले हम आज़ादी से क्या स...

उच्च संस्कृति -श्रेष्ठता की होड़

चित्र
पहचान से हम आम तौर पर हम लोग यही लेते है की हम हमारे आस पास के लोग जानते है और पहचानते है।पहचान इस अर्थ में केवल हम अपने खुद की ही मानते है या इसपर अधिक ध्यान देते है।व्यक्तिगत पहचान सबसे प्रमुख होती है हमारे लिए क्योंकि हम जिस समाज ,वातावरण या माहौल में रहते है कोई हमे हमे अगर पहचाने ही नहीं तो फिर आपमें कोई बात नही या आपने इसकी आवश्यकता नहीं समझी ।व्यक्तिगत पहचान भी किसी भी स्थाई निवास में आवश्यक होता है और आदमी इसी के अनुसार ही काम करता है।खैर आदमी अपनी सभी गतिविधियां अपने और अपने से जुड़े व्यक्तियों , सदस्यों , परिवार आदि की जरूरत , सुरक्षा , मदद के लिए अपनी पहचान को बनाता है फिर चाहे वो सीमित क्षेत्र हो या वृहद क्षेत्र। वही इसके अलावा पहचान की एक अलग स्तर या क्षेत्र है जोकि शायद ही कोई ध्यान देता है । मैं जिस पहचान की बात कर रहा हूं वह है आपके समाज , संस्कृति की पहचान।उदाहरण के तौर पर अगर आप एक उत्तर भारतीय है और भोजपुरी समाज से आते है और आप अपने आर्थिक कारणों से कही अलग क्षेत्र जैसे मुंबई ,महाराष्ट्र जैसे क्षेत्र में विस्थापित हो गए है तो आपको अपनी संस्कृति ,भाषा व्य...

रिश्तो में दूरियां-- पति- पत्नी

चित्र
किसी भी रिश्ते और संबंधों को कायम करने के पीछे मानव का स्वार्थ,जरूरत,सम्मान, भूमिका, चाह,प्रेम आदि हो सकते है पर सफल रिश्ते के लिए या लंबे समय तक चलने वाले रिश्ते या संबंधों के लिए सम्मान और विश्वास ऐसे मुख्य दो आधार बहुत महत्वपूर्ण है, पर मेरे हिसाब से इनके अतिरिक्त सीमित दूरियां भी रिश्तों को सफल और कामयाब बनाने में अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है ।रिश्तों में दूरियां आवश्यक है पर एक सीमित मात्रा में।ऐसा मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं जोकि अपने समाज में अनुभव और अध्ययन किया है ,उसी के आधार पर अपना मत आप लोगो के सामने रख रहा हूं।हो सकता है ऐसा ना होता हो या आप इस मत से सहमत न हो ,पर इतना अवश्य कह सकता हूं की अगर आप मेरे पूरे संस्करण को पढ़ेंगे और समझेंगे तो जरूर मानेंगे मेरे विचार से।वैसे मैं अपने इस लेख में एक खास रिश्ता पर अपना मत दे रहा हूं जोकि हमारी भारतीय समाज की वंशावली प्रगति का आधार माना जाता है ,वो रिश्ता है पति पत्नी का। आदमी जब इस मानव रहित समाज में जन्म लेता हैं तो उसका किसी से रिश्ता नही होता केवल एक मां ही है जिससे उसकी आत्मीयता का संबंध जुड़ा ...

अपनी अपनी दुनिया

चित्र
अगर दुनिया शब्द के भाव या अर्थ को समझते है तो पृथ्वी पर बसी पूरी मानव जाति या पूरा ब्रह्मांड आ जाता है।जिसमे सम्पूर्ण गतिविधियां शामिल होती है।दुनिया शब्द जितना आसान है बोलना हमारे लिए उतना ही मुश्किल है समझना।हम आमतौर अपने जीवनचर्या में आए दिन दुनिया का जिक्र किसी न किसी मौखिक संस्करणों में करते रहते है,कहने का मतलब हम सभी मानव जाति के ऐसे कई पक्षों का जिक्र करते है जिन्हे न तो हम जानते है और न ही परिचित होते है ,पर फिर भी हम उनसे,प्रेरणा ,प्यार,आशा,नफरत,आदि भावों का प्रदर्शन करते या रखते है।ऐसा क्यूं?  क्योंकि अपने साथ हम उन्हें भी अहसास कराने का प्रयास करते है की हम सभी एक ऐसी दुनिया का हिस्सा है ,जोकि परिवर्तन शील ,प्रगतिशील है तथा इसी क्रम में हम अपने मानवीय मूल्यों की रक्षा कर सके और नकारात्मक दृष्टिकोणों की अवहेलना करने का प्रयास करते है ताकि आने वाली समाज को सकारात्मक प्रगतिशील माहौल मिल सके। लेकिन इस मानव समाज में दुनिया के अपने अपने अर्थ है ,दायरा है,प्रभाव है,कार्यशाला है या इसके  कई पहलू है जिनमे सिमट कर या निर्धारित क्षेत्र तक ही सीमित होता है।जैसे प्र...

संस्कृति की छाप

चित्र
भारतीय संस्कृति मैने किसी आर्टिकल में पढ़ा था कि बाहरी देश शायद जर्मनी में होटलों,रेस्तरां या खाने पीने वाली दुकानों में खाना छोड़ना दंडनीय अपराध या जुर्माना भरना पड़ता है ,इसलिए वहां के लोग खाना बर्बाद नही करते ।खासतौर पर आज के युग में भुखमरी से जूझ रहे लोग दुनिया देखा जाए तो कम नहीं है ।ऐसे बहुत से लोग है जिन्हे मुश्किल से एक वक्त का भोजन मिल पाता है।जर्मनी या अन्य देश द्वारा अपनाए गए ऐसे संस्कार या नियम बहुत ही अच्छे है,पर इन आधारों पर कोई भारतीयों या हमें ताना देता है की सबसे ज्यादा खाना बर्बाद करने में हमीं या भारतीय है ,इस बात से मैं पूरी तरह नकारता हूं।मेरे ख्याल से ऐसा कोई भारतीय नहीं होगा जो इस तरह का कार्य या भोजन की बरबादी करता होगा। क्योंकि हमारी संस्कृति इस प्रकार की है की भारतीय स्वयं भूखा रहकर किसी भूखे का पेट भरना ज्यादा पसंद करता है। हमारे भारतीय संस्कार में खाना बनाने का एक अलग रिवाज कह लो या तरीका है।जिसमे हम परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त एक या दो अन्य व्यक्तियों का भोजन अतिरिक्त बनाते या बनता है।क्योंकि हमारी धारणा रही की हमारे घर पर कोई भी सन्यासी,साधु,...